M.K.Gandhi’s Concept of State

0:00

राज्य के संबंध में महात्मा गांधी की विचारधारा अराजकतावादी दार्शनिक क्रोप्टकिन और लियो टॉलस्टाय के विचारों से प्रभावित है। गांधी जी ने राज्य के वर्तमान या भावी स्वरूप के विषय में अपने विचार स्पष्ट रूप से लिपिबद्ध नहीं किया क्योंकि वे भविष्य की संस्थाओं की रूपरेखा निर्धारण को असामयिक और अवैज्ञानिक मानते थे तथापि उनके राज्य संबंधी विचारों का अध्ययन उनके लेखों और व्याख्यानों मे व्यक्त विचारों के आधार पर किया जा सकता है। गांधी जी का कथन है, “मैं राज्य की शक्ति में किसी प्रकार की वृद्धि को अधिकतम भय की दृष्टि से देखता हूं यद्यपि देखने में ऐसा लगता है कि राज्य कानूनों के माध्यम से शोषण कम कर, जनहित का काम कर रहा है परंतु यह मनुष्य मात्र को सबसे बड़ी हानि पहुंचाता है क्योंकि इसके द्वारा व्यक्तिवाद का नाश होता है। जो सभी प्रकार की उन्नति का मूल है।”
गांधी जी के अनुसार, “कोई भी कार्य,जो स्वेच्छापूर्वक किया जाए वही नैतिक हो सकता है लेकिन राज्य आज्ञा देता है इसलिए उसका कोई कार्य नैतिक नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त राज्य के अधिकार का आधार हिंसा है, यह सामूहिक और संगठित रूप से हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है, यह एक आत्महीन यंत्र है।”
एक बार उन्होंने कहा था, “व्यक्ति में आत्मा होती है, लेकिन राज्य एक निष्प्राण मशीन है, और उसे हिंसा से कभी मुक्त नहीं किया जा सकता, जिसके कारण उसका अस्तित्व है।” दूसरे शब्दों में, गांधीजी ने राज्य और हिंसा दोनों को समानार्थी माना।

यहाँ गांधी हमें एक महान व्यक्तिवादी दार्शनिक के रूप में दिखाई देते हैं। दो महान उपयोगितावादी दार्शनिक – बेंथम (1748-1832) और जे. एस. मिल (1806-1872) – व्यक्तियों की स्वतंत्रता का क्षेत्र बढ़ाने के लिए राज्य की गतिविधियों पर अंकुश लगाना चाहते थे। बेंथम और मिल द्वारा निर्धारित राज्य को सीमित राज्य कहा जाता है। बेंथम और जे. एस. मिल, दोनों ही व्यक्ति से निष्ठा की माँग के लिए जबरदस्ती का समर्थन नहीं करते थे। लेकिन गांधी ज़्यादा आक्रामक लगते हैंक्योंकि उनके अनुसार किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति गांधी का प्रेम उन्हें महान अराजकतावादी दार्शनिकों में एक सिद्ध करता है।

राज्य की सत्ता का विरोध :
गांधी जी ने नैतिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आधार पर राज्य की आलोचना की है। उनके अनुसार, व्यक्ति का नैतिक विकास उसकी आंतरिक इच्छाओं और भावनाओं पर निर्भर है लेकिन राज्य का संगठन व्यक्ति आधारित होने से व्यक्ति के बाहरी कार्यों को ही प्रभावित करता है। राज्य व्यक्ति से कार्य उसकी इच्छा से नहीं बल्कि दंड के भय और कानून की शक्ति से बाध्य कर करवाना चाहता है इसलिए राज्य अनैतिक होता है।

पश्चिमी सभ्यता में राज्य की अवधारणा और हिंसा पर गांधी :

गाँधीजी ने पश्चिमी आधुनिकता, विशेष रूप से औद्योगीकरण, प्रौद्योगिकी और केंद्रीकृत सत्ता संरचनाओं की आलोचना की और इसे मानव कल्याण के लिए हानिकारक बताया।
गांधी के अनुसार, राज्य (पश्चिमी प्रकार) सघन रूप में हिंसा का प्रतीक था। नागरिकों की निष्ठा सुनिश्चित करने के लिए, राज्य (अर्थात् उसका प्राधिकार) निर्दयतापूर्वक बल प्रयोग या हिंसक उपाय करता है। पश्चिमी राज्य प्रणाली के बारे में उनकी भावनाएँ उनकी एक टिप्पणी में स्पष्ट रूप से व्यक्त होती हैं, “मैं राज्य की शक्ति में वृद्धि को सबसे अधिक भय के साथ देखता हूँ, क्योंकि यद्यपि यह शोषण को न्यूनतम करके अच्छा कार्य करता है, फिर भी यह प्रगति के मूल में स्थित वैयक्तिकता को नष्ट करके मानव जाति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता है।”
गांधी जी के विचार अनुसार राज्य केंद्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतिनिधित्व करने वाला आत्महीन यंत्र है, इसकी उत्पत्ति हिंसा से हुई है इसलिए इसे हिंसा से पृथक नहीं किया जा सकता। गांधीजी का मानना था कि राज्य, जैसा कि वह अस्तित्व में है, स्वाभाविक रूप से हिंसक और उत्पीड़न का साधन है, और वे अंततः एक राज्यविहीन समाज की आकांक्षा रखते थे जहां व्यक्ति अहिंसक साधनों के माध्यम से स्वयं पर शासन करें।

वस्तुत: राज्य के विरुद्ध होने के बावजूद गांधी जी राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते थे तथा इस संबंध में उनके सिद्धांत ‘स्पेंसर’ जैसे व्यक्तिवादी के सिद्धांत से बहुत मिलता है। गांधीजी थोरो के इस सिद्धांत में विश्वास करते थे कि “वह सरकार सबसे अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है।” अतः राज्य से संबंधित उनके विचार में राज्य का कार्यक्षेत्र सीमित होना चाहिए ताकि वह व्यक्ति की स्वतंत्रता में कम से कम हस्तक्षेप कर सके और नागरिकों को अधिकाधिक नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो।
गांधीजी महान व्यक्तिवादी थे लेकिन साथ ही उनका मानना था, “असंयत व्यक्तिवाद, जंगली पशु का कानून है।” अत्यव महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अनुशासन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए अहिंसात्मक राज्य का सिद्धांत दिया। महात्मा गांधी के सिद्धांत के अनुसार अहिंसात्मक राज्य का उद्भव व्यक्ति के आत्मबल या अहिंसा से होता है, जब लोग आत्म-संयम, सत्याग्रह की पद्धति और सहयोग करना सीख लेते हैं तो अहिंसात्मक राज्य का उद्भव होता है अतः गांधी जी के भावी राज्य की रूपरेखा प्रजातांत्रिक एवं नैतिक आदर्श से संचालित होने पर औचित्यपूर्ण थी। उन्होंने कहा था, “हिंदू स्वराज में जो कुछ तथ्य है वह एक आदर्श राज्य को बताता है।”

गांधी जी के इस अहिंसात्मक राज्य के प्रमुख घटक या अवयव थे –
A.सत्ता का विकेंद्रीकरण
B.राज्य का न्यूनतम कार्य क्षेत्र
C.आदर्श समाज या राम राज्य
D.आर्थिक क्षेत्र में विकेंद्रीकरण
E.नागरिकों को अधिकार एवं अनिवार्य श्रम की व्यवस्था।

महात्मा गांधी राज्य को व्यक्ति रूपी साध्य के लिए एक साधन मानते थे तथा राज्य के अस्तित्व का औचित्य, व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को मानते थे। समाजवादियों की भांति वे राज्य को अन्य समाज में एक समाज मानते थे। गांधी जी लोकतंत्रवादी थे, अतः वे किसी भी प्रकार के राजनीतिक-सामाजिक भेदभाव के पक्षधर नहीं थे। गांधीजी संप्रभुता का निवास सर्वसाधारण में मानते थे तथा वे टी. एच. ग्रीन के समान,व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध अधिकार देते थे कि यदि राज्य अपनी शक्ति का दुरुपयोग करें तो हमें सत्याग्रह द्वारा इसका प्रतिरोध करना चाहिए।

राज्य के बारे में गांधी के मूल विचार:

राज्य के संबंध में गांधी जी के निम्नलिखित विचार उल्लेखनीय है –

1.केंद्रीकृत सत्ता या आधुनिक राज्य का अस्वीकरण:

गाँधीजी आधुनिक राज्य को, जो बल और नौकरशाही पर निर्भर था, स्वाभाविक रूप से दोषपूर्ण और अपने आदर्शों के विपरीत मानते थे।
गांधी राज्य में सत्ता के संकेंद्रण के आलोचक थे और इसे उत्पीड़न का एक संभावित स्रोत मानते थे। उनका मानना था कि एक सच्चा न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज केवल अहिंसा के सिद्धांतों पर ही निर्मित किया जा सकता है, चाहे वह व्यक्तिगत आचरण हो या शासन-संरचना।

विकेंद्रित सत्ता या ग्राम गणराज्य (पंचायती राज):
गांधी जी संपूर्ण भारत में प्राचीन ढंग की स्वतंत्र और स्वावलंबी ग्राम समुदायों की स्थापना चाहते थे,जिनका आधार ग्राम पंचायत होंगी। गांधीजी ने अपने समय के केंद्रीकृत, दमनकारी स्वरूप से मौलिक रूप से भिन्न एक राज्य की कल्पना की थी। उन्होंने एक विकेन्द्रीकृत, अहिंसक राज्य का विचार दिया, जिसकी जड़ें स्वशासित और आत्मनिर्भर ग्राम समुदायों में निहित थीं और जिसमें व्यक्तिगत उत्तरदायित्व और स्वराज (स्वशासन) पर ज़ोर दिया गया था।

उन्होंने एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज की नींव के रूप में स्वशासित ग्राम गणराज्यों (ग्राम स्वराज) की व्यवस्था का समर्थन किया।
गाँधीजी ने ग्राम-स्तरीय स्वशासन की एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना की थी, जहाँ समुदाय आत्मनिर्भर होंगे और निर्वाचित पंचायतों के माध्यम से अपने मामलों का प्रबंधन स्वयं करेंगे।

2.राज्य की संप्रभुता :
गाँधी जी को एक व्यापक और सुविचारित राजनीतिक सिद्धांत गढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। वे एक जननेता, दार्शनिक और स्वतंत्रता सेनानी थे। विभिन्न मुद्दों और परिस्थितियों पर उन्होंने ऐसे विचार व्यक्त किए जो राजनीतिक सिद्धांत के कुछ पहलुओं का निर्माण करते हैं और राज्य की संप्रभुता ऐसा ही एक सिद्धांत है। पश्चिमी राजनीतिक चिंतन में, राज्य की संप्रभुता एक बहुचर्चित सिद्धांत है और अनेक विद्वानों और दार्शनिकों ने इस अवधारणा पर विचार किया है। बोडिन और हॉब्स इनमें प्रमुख हैं। सामान्य शब्दों में, संप्रभुता का अर्थ राज्य की सर्वोच्च दमनकारी शक्ति है। गांधीजी ने इस शक्ति का कड़ा विरोध किया था क्योंकि सर्वोच्च दमनकारी शक्ति व्यक्ति की स्वतंत्रता का निर्मम तरीके से हनन करती है। संप्रभुता बलपूर्वक निष्ठा प्राप्त करती है। राज्य की ऐसी शक्ति गांधीजी को स्वीकार्य नहीं हो सकती। संभवतः दक्षिण अफ्रीका के ज़ुलु “विद्रोह” ने उनके मन और विचार को अत्यधिक प्रभावित किया था।

3.विधायिका के विषय में गांधी के विचार ;

गांधीजी को हिंसा और सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक राज्य पर कोई भरोसा नहीं था, इसलिए उन्होंने इस राजनीतिक संगठन की किसी अन्य शाखा का समर्थन नहीं किया। संसदीय राज्य प्रणाली वाली सरकार में संसद या विधायिका, शासन की तीन शाखाओं में से एक होती है, ब्रिटिश संसद के खिलाफ उनका तीखा हमला कई लोगों के लिए मनोरंजन का स्रोत है।
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश संसद सभी संसदों की जननी है। लेकिन इस संसद ने अपने आप में एक भी अच्छा काम नहीं किया है। हालाँकि इसके अध्यक्ष बाल्फोर या एस्क्विथ जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, फिर भी इसका काम बिल्कुल भी प्रशंसनीय नहीं है, तो यह संसद एक बाँझ स्त्री के समान है। प्रोफ़ेसर जयंतनुज बंद्योपाध्याय ने अपनी प्रसिद्ध कृति, “गाँधी के सामाजिक और राजनीतिक विचार” में गांधी के इस कठोर कथन को “युवावस्था की अतिशयोक्ति” कहा है।” बाद में उन्होंने संसद के महत्व के बारे में अपनी राय बदली। उन्होंने कहा कि आज की विधायिकाएँ उपयोगी कार्य करती हैं। उन्हें नष्ट करने का कोई प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि वर्तमान विधायिकाएँ पुरानी विधायिकाओं से बेहतर हैं। ब्रिटिश संसद की बाँझपन के बारे में पहली टिप्पणी भावनाओं का विस्फोट थी। दूसरी
वास्तविक स्थिति की अभिव्यक्ति थी। पिछली सदी के तीसवें दशक के उत्तरार्ध में गांधीजी ने जनप्रतिनिधियों से युक्त विधायिका की उपयोगिता को पूरी तरह से समझ लिया था।

4.लोकतांत्रिक शासन : गांधीवादी राज्य में जनता को मतदान का अधिकार होता है। जनता सक्रिय रूप से शासन संचालन में भाग लेने की अधिकारी होती है तथा सत्ता सीमित और जनता के प्रति उत्तरदाई होती है।

5.स्वराज की संकल्पना : स्वराज की अपनी संकल्पना को परिभाषित किया है – “स्वराज से मेरा मतलब भारत की उस सरकार से है जो स्त्री-पुरुष, वासी- अधिवासी, में किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना ऐसी व्यस्क जनता से बनी हो,जो राज्य को अपना श्रम देते हैं और जिन्होंने स्वयं करदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया हो, मेरे लिए स्वराज का अर्थ, अपने देश के दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति की स्वतंत्रता है।”

6..आर्थिक क्षेत्र में विकेंद्रीकरण : महात्मा गांधी आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और शोषण के अंत के पक्षधर थे। गांधी जी के विचारानुसार राज्य में विशाल तथा केंद्रीकृत उद्योगों को लगभग समाप्त कर उनकी जगह कुटीर उद्योग धंधे चलाए जाएं और वैसी मशीनों का प्रयोग हो जो मनुष्य के लिए सुविधाजनक हो पर मानवीय शोषण का साधन नहीं हो। गांधी जी का विचार था प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकता की वस्तुएं स्वयं उत्पन्न करेगा तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने उत्पादन के साधनों का स्वयं स्वामी होगा।

7.नागरिकों के अधिकार : गांधी जी का राज्य स्वतंत्रता, समानता तथा अन्य नागरिक अधिकारों पर आधारित था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति और समुदायों के निर्माण की स्वतंत्रता होगी सभी व्यक्ति को राज्य में समान राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त होंगे तथा जाति, धर्म, भाषा, वर्ण या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा।

8.राज्य में व्यक्ति की भूमिका : उनका मानना था कि हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से स्व-शासन और नैतिक निर्णय लेने में सक्षम होता है और एक सच्चा न्यायपूर्ण समाज उन्हें अपने शासन में पूर्ण रूप से भाग लेने के लिए सशक्त बनाएगा। उनके विचारानुसार व्यक्तिवाद ही प्रगति का मूल कारण है। गांधीजी का मानना था कि ज़बरदस्ती से कुछ नहीं किया जा सकता तथा व्यक्ति को उसकी इच्छा या सहज इच्छा के विरुद्ध कोई भी काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में, गांधीजी के अनुसार, समाज की प्रगति उन कार्यों के माध्यम से हो सकती है जिन्हें व्यक्ति स्वेच्छा से करते हैं।

9..निजी संपत्ति का आस्तित्व : गांधी जी के अनुसार, राज्य में निजी संपत्ति का आस्तित्व होगा परंतु संपत्ति के स्वामी अपनी धन संपदा का उपयोग निजी स्वार्थ में नहीं बल्कि सामाजिक कल्याण के लिए इस विचार के साथ करें कि उनकी संपत्ति का वास्तविक स्वामी समाज है तथा समाज ने ही उन्हें इस संपत्ति का संरक्षक नियुक्त किया है।

10..अनिवार्य श्रम : महात्मा गांधी के विचार में राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपने भरण पोषण के लिए श्रम करना अनिवार्य होगा तथा कोई भी व्यक्ति दूसरों की अर्जित संपत्ति का उपयोग अपने निर्वाह के लिए नहीं करेगा। बौद्धिक श्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए भी श्रम अनिवार्य होगा।

11. अस्पृश्यता का अंत : गांधी जी अस्पृश्यता को भारतीय समाज का कलंक मानते थे। अत: गांधीवादी राज्य में इसकी कोई जगह नहीं है।

12.. सांप्रदायिकता का अंत : गांधी जी के अनुसार, राज्य में किसी एक धर्म को राज्याश्रय प्राप्त नहीं होना चाहिए। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान और सभी धर्मावलंबियों को समान सुविधा प्राप्त होनी चाहिए।

13. गो-वध निषेध : महात्मा गांधी भारत जैसे राज्य में आर्थिक तथा धार्मिक दृष्टि से गाय की रक्षा को अति-आवश्यक मानते थे इसलिए उन्होंने राज्य द्वारा गो-वध निषेध का समर्थन किया।

14. मद्य निषेध : गांधीजी के अनुसार मद्य तथा अन्य मादक पदार्थों के सेवन से व्यक्ति का चारित्रिक पतन होता है, अत: राज्य में मादक पदार्थों का उत्पादन और विक्रय नहीं होना चाहिए।

15. नि: शुल्क प्राथमिक शिक्षा : गांधी जी के विचारानुसार, राज्य में बुनियादी ढंग की स्वावलंबी पाठशालाएं होंगी, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम प्राथमिक शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाएगी।

16. अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्तिप्रियता : गांधीजी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य के अन्य राष्ट्रों के साथ मैत्री, सहयोग और सद्भावना के आधार पर संबंध स्थापित करने के पक्षधर थे।

अंततः महात्मा गांधी के राज्य संबंधी विचारों के आधार पर उन्हें दार्शनिक अराजकतावादी की श्रेणी में रखा जा सकता है। वस्तुत: सैद्धांतिक रूप से राज्य को,हिंसा आधारित आत्महीन यंत्र मानने के बावजूद गांधीजी वर्तमान परिस्थितियों में राज्य को समाप्त करने के पक्षधर नहीं थे। गांधी जी के अनुसार, “आदर्श समाज राज्य विहीन प्रजातंत्र है। ऐसे राज्य में सामाजिक जीवन इतना पूर्ण हो जाता है कि इसके नियंत्रण या नियमन के लिए किसी कानून या राज्य की आवश्यकता नहीं रह जाती है।”
गांधी जी यह भी मानते थे कि वर्तमान समय में मानव जीवन इतना पूर्ण नहीं है कि वह स्वयं संचालित हो सके इसलिए समाज में राज्य और राजकीय शक्ति की जरूरत है। अतएव राज्य को एक आवश्यक बुराई के रूप में स्वीकार कर गांधी जी ने राज्य के कार्यक्षेत्र को अपने सिद्धांतों द्वारा सीमित करने का प्रयत्न किया ताकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कम से कम हस्तक्षेप हो।

अत: गांधीजी के राज्य संबंधी विचारों को सैद्धांतिक दृष्टि से अराजकतावादी तथा व्यवहार में व्यक्तिवादी कहा जा सकता है।उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अनुभव प्राप्त किया कि राज्य को अधिक से अधिक शक्ति मिलने का अर्थ है अधिक से अधिक हिंसा या अधिक से अधिक बल प्रयोग। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार ने अपार शक्ति अर्जित कर ली, जिसके परिणामस्वरूप निर्मम प्रशासनिक शोषण और व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा।उपरोक्त विश्लेषण से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गांधी ने पश्चिमी मॉडल के राज्य को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया था कि वह हिंसा या ज़बरदस्ती का प्रतीक है। अब सवाल यह है कि उन्होंने हिंसा का इतना विरोध क्यों किया? गांधी के अनुसार, आधुनिक राज्य व्यक्तित्व को नष्ट करने वाला था—व्यक्तिगत स्वतंत्रता और काम करने की सहजसहज इच्छा को।
वस्तुत; गांधी के राज्य से संबद्ध विचार पूंजीवादी और साम्यवादी, दोनों सिद्धांतों का एक मौलिक विकल्प देता है। जहाँ साम्यवाद वर्गहीन समाज बनाने के लिए राज्य के तंत्र पर अधिकार करना चाहते हैं, वहीं गांधी का कहना था कि एक बेहतर समाज सिर्फ़ राज्य की भूमिका को धीरे-धीरे कम करके ही बनाया जा सकता है। उनके सिद्धांत में संप्रभुता कानूनी और अनिवार्य रूप से मान्य नहीं होती बल्कि स्वायत्तता , आत्मनिर्भरता’ या ‘स्वावलंबन और अहिंसा के नैतिक और आध्यात्मिक पर आधारित होती है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top