Linguistic Debates & State Re-organisation in India

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‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम,1956’,भारत के राज्यों और उनकी क्षेत्रीय सीमाओं के भाषाई आधार पर पुनर्गठन से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण अधिनियम था। हालाँकि 1956 के बाद से भारत में विभिन्न राज्यों की सीमाओं में कई बार परिवर्तन किए गए हैं, लेकिन 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के द्वारा, स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन राज्यों की सीमाओं में सबसे व्यापक परिवर्तन किया गया था। यह अधिनियम संविधान संशोधन (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के साथ ही प्रभावी हुआ, जिसने (अन्य प्रावधानों के अलावा) भारत के मौजूदा राज्यों की सीमाओं का पुनर्गठन किया और भारत के संविधान के भाग 1 अनुच्छेद 3 के प्रावधानों के तहत राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 को पारित करने की आवश्यकताओं को पूरा किया।

भारतीय राष्ट्रवादी, आरंभ से ही जन-आंदोलन में मातृभाषा के प्रभाव से परिचित थे। भारत विविध भाषाओं का देश है, जिसमें हर एक की अपनी लिपि, व्याकरण, शब्द-भंडार और साहित्यिक परंपराएं हैं। इन भाषाओं के महत्व को समझ कर 1917 में ही कांग्रेस पार्टी ने इस संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की तथा आजादी मिलने के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का निर्णय लिया। 1917 में कांग्रेस पार्टी ने एक अलग ‘आंध्र प्रकोष्ठ’ और उसके अगले वर्ष सिंधी भाषाई क्षेत्रों के लिए,’सिंध प्रकोष्ठ’ का गठन किया। 1920 ई. में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के बाद भाषाई आधार पर प्रदेश कांग्रेस समितियों का गठन कर इस सिद्धांत को औपचारिक बना दिया गया। ‘कर्नाटक प्रदेश प्रांतीय कांग्रेस समिति’, ‘उड़ीसा प्रांतीय कांग्रेस समिति’, ‘महाराष्ट्र प्रांतीय कांग्रेस समिति’ आदि का गठन किया गया। कांग्रेस के यह सारे प्रांतीय संगठन ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक इकाइयों की सीमा से मेल नहीं रखते थे। कांग्रेस संगठन को भाषाई आधार पर संगठित करने के प्रयासों का गांधी जी ने भी स्वागत किया था, 10 अक्टूबर 1947 को उन्होंने एक सहयोगी को पत्र लिखा कि “मैं इस बात पर यकीन करता हूं कि हमें भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन पर तेजी से काम करना चाहिए यहां कुछ समय के लिए भ्रम हो सकता है कि अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इसकी ज्यादा संभावना है की भाषाई आधार पर प्रांतों का गठन होने से यह भावना लुप्त हो जाएगी।”

(1). ब्रिटिश भारत में भाषाई राज्यों के लिए आंदोलन :
भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग भारत के ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने से पहले ही आरंभ हो गई थी, जिनमें ओड़िया, तेलुगु और कन्नड़ भाषी राज्य के लिए तथा बंबई, किस भाषाई राज्य की राजधानी बने या स्वतंत्र नगर का अस्तित्व रखे, इसके लिए सशक्त और कुछ जगह हिंसक जन आंदोलन हुए।

(A).ओडिया भाषी राज्य :
पहला भाषाई आंदोलन 1895 में ओडिया भाषी राज्य के लिए हुआ था है इसमें मौजूदा बिहार और उड़ीसा प्रांत को विभाजित करके एक अलग उड़ीसा प्रांत बनाने की मांग की गई थी। ओडिया राष्ट्रवाद के जनक ‘मधुसूदन दास’ के प्रयासों के फलस्वरूप आंदोलन ने अंततः 1936 में अपना उद्देश्य हासिल किया, जब उड़ीसा प्रांत भाषाई आधार पर संगठित होने वाला पहला भारतीय राज्य (स्वतंत्रता-पूर्व) बन गया।

(B).कन्नड़ भाषी राज्य :
ब्रिटिश शासन के दौरान, वर्तमान कर्नाटक के क्षेत्र 20 से ज़्यादा विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों के अधीन थे, जिनमें मैसूर रियासत, निज़ाम शासित हैदराबाद , बॉम्बे प्रेसीडेंसी, मद्रास प्रेसीडेंसी और कोडागु क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण थे। कर्नाटक का लगभग पूरा दक्षिणी भाग उस समय मैसूर के वोडेयार शासकों के अधीन था, राज्य की आधिकारिक भाषा ‘कन्नड़’ थी और यह राज्य उस समय के सबसे प्रगतिशील राज्यों में से एक था। वर्तमान कर्नाटक का लगभग दो-तिहाई हिस्सा मैसूर के वोडेयार राजाओं के शासन से बाहर था।
इन क्षेत्रों में कन्नड़ लोगों को, उनकी बड़ी संख्या के बावजूद, प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त नहीं था। उदाहरण के लिए, ‘हुबली-कर्नाटक’ क्षेत्र के कन्नड़ लोग ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ के शासन के अधीन थे, जहाँ ‘मराठी’ राजभाषा थी। ‘हैदराबाद-कर्नाटक’ क्षेत्र के कन्नड़ लोग निज़ाम के शासन के अधीन थे, जहाँ ‘उर्दू’, मुख्य भाषा थी।निज़ाम के अधीन कन्नड़ लोगों पर उर्दू जबरदस्ती थोपी गई भाषा लगती थी। दक्षिण कर्नाटक के कन्नड़ लोग मद्रास प्रेसीडेंसी के शासन के अधीन थे, जहाँ ‘तमिल’ उनकी मुख्य भाषा थी। इन परिस्थितियों में,मैसूर के बाहर कन्नड़ भाषियों ने भाषाई उत्पीड़न को आधार बना कर विरोध आरम्भ किया। सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग राज्य के निर्माण की माँग के लिए आरम्भ इस आंदोलन को,’एकीकरण’ आंदोलन’ कहा जाता है।

इस आंदोलन के प्रारंभिक और सबसे महत्वपूर्ण संगठनों में से एक, ‘कर्नाटक विद्यावर्धक संघ’,धारवाड़, की स्थापना 1890 में, ‘आर. एच. देशपांडे’ के द्वारा, (बॉम्बे प्रेसीडेंसी में हाशिए पर चली गई), कन्नड़ भाषा के पुनरुत्थान के उद्देश्य से की गई थी, क्योंकि वहां मराठी आधिकारिक भाषा थी। विद्यावर्धक संघ के प्रभाव और सफलता के कारण जल्द ही पूरे कन्नड़ भाषी क्षेत्र में ऐसे और संगठन स्थापित हुए। इनमें सबसे उल्लेखनीय थे कन्नड़ साहित्य परिषद (बैंगलोर), जिसकी स्थापना 1915 में हुई थी, और कर्नाटक संघ (शिवमोग्गा), जिसकी शुरुआत 1916 में हुई थी। आंदोलन से जुड़े संगठनों ने रैलियाँ, वार्ताएँ और सम्मेलन आयोजित करना शुरू कर दिया, जिसमें कन्नड़ भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की माँग की गई। इस परिषद को मैसूर के शासक का संरक्षण मिला। परिषद ने राज्य के विभिन्न भागों में वार्षिक साहित्यिक सम्मेलन आयोजित करना शुरू किया (जो आज भी जारी हैं)। कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के बुद्धिजीवी इन सम्मेलनों में शामिल होते थे।

1920 में, धारवाड़ में कर्नाटक राज्य राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया गया। वी.पी. माधव राव की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन में, सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण की मांग का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया गया। सम्मेलन में कन्नड़ लोगों को उसी वर्ष अर्थात दिसंबर 1920 में होने वाले नागपुर अधिवेशन में बड़ी संख्या में उपस्थित होने की सलाह भी दी गई।
नागपुर अधिवेशन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 35वां वार्षिक अधिवेशन था, जिसमें कांग्रेस की कार्य समितियों को भाषाई आधार पर पुनर्गठित करने का प्रस्ताव पारित किया गया तथा अन्य भाषाई कार्य समितियों के साथ हीं, कर्नाटक प्रदेश प्रांतीय कांग्रेस समिति का गठन हुआ।इससे आंदोलन को बल मिला और एस. निजलिंगप्पा और केंगल हनुमंतैया (दोनों ही आगे चलकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने) और गुडलेप्पा हल्लिकेरी जैसे कांग्रेस नेताओं ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

26 दिसंबर 1924 में, कांग्रेस की नवगठित कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति के तत्वावधान में बेलगाम में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 39वां अधिवेशन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में कन्नड़ भाषी लोगों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में, ‘हुइलगोल नारायण राव’ ने पहली बार कन्नड़ राज्य के लिए स्व-रचित गीत, “उदयवगली नम्मा चेलुवा कन्नड़ नाडु (हमारी मनमोहक कन्नड़ भूमि का उदय हो )” गाया था। कांग्रेस ने इस आंदोलन को औपचारिक समर्थन दिया; यह पहली बार था जब इस आंदोलन को स्पष्ट राजनीतिक समर्थन प्राप्त हुआ। इन सम्मेलनों के परिणामस्वरूप, कर्नाटक एकीकरण सभा ( बाद में कर्नाटक एकीकरण संघ ) की स्थापना हुई, जिसने कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के साथ मिलकर कर्नाटक के एकीकरण के उद्देश्य से काम किया।

(2).कांग्रेस द्वारा भाषा आधारित राज्य पुनर्गठन को समर्थन :
ब्रिटिश शासन में कांग्रेस द्वारा भाषा आधारित राज्य निर्माण के लिए विभिन्न प्रस्ताव लाए गए-
(A). नेहरू समिति :
नेहरू रिपोर्ट का मसौदा साइमन कमीशन के जवाब में तैयार किया गया था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में भारत सरकार अधिनियम, 1919 की समीक्षा करने और संवैधानिक सुधारों का सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था, लेकिन इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। सरकार द्वारा भारतीयों को संविधान निर्माण के अयोग्य कहे जाने के प्रति उत्तर में अगस्त 1928 में प्रस्तुत संवैधानिक मसौदे में अन्य प्रस्तावों के साथ ही भाषाई आधार पर प्रांतीय सीमाओं के पुनर्गठन की सिफारिश की गई थी। नेहरू समिति ने सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर एक प्रांत के गठन की सिफ़ारिश की। समिति ने कहा कि “प्रथम दृष्टया एकीकरण का एक मज़बूत मामला” है। समिति ने यह भी कहा कि उनका मानना है कि कर्नाटक आर्थिक रूप से भी एक मज़बूत प्रांत हो सकता है। इस सिफ़ारिश ने आंदोलन को बल दिया।

(B). 1937 के चुनाव :
साइमन कमीशन के बाद, 1937 में चुनाव हुए। कांग्रेस ने कहा कि वह अलग कर्नाटक और आंध्र राज्यों के गठन के पक्ष में है। इसका अंग्रेजों और कुछ रियासतों की ओर से कुछ विरोध हुआ। जहाँ रियासतों को डर था कि उन्हें कुछ क्षेत्र गँवाना पड़ सकता है, वहीं अंग्रेज़ भी इस पुनर्गठन को लेकर अनिश्चित थे। एकीकरण आंदोलन का दसवाँ सम्मेलन 10 जनवरी 1946 को मुंबई में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन सरदार पटेल ने किया था और इसमें बॉम्बे प्रेसीडेंसी के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. जी. खेर जैसे कई लोग शामिल हुए थे। सम्मेलन में अपने भाषण में, सरदार पटेल ने कहा कि “स्वतंत्र भारत की नई सरकार की प्राथमिकताओं में सभी भाषाई समूहों के हित सबसे ऊपर होंगे”।

(3).भारत की आजादी के बाद का परिदृश्य :

धार्मिक आधार पर, देश के विभाजन के बाद कांग्रेस पार्टी, भाषा के आधार पर जनता के मध्य एक नई दूरी उत्पन्न होने के प्रति आशंकित थी। संविधान सभा में कांग्रेस के नेताओं ने प्रयास किया कि भाषाई आधार पर राज्यों के निर्माण के संदर्भ में कांग्रेस की स्वतंत्रता पूर्व की आधिकारिक नीति को बदल दिया जाए। अतः इस ज्वलंत समस्या के समाधान के उद्देश्य से, संविधान सभा ने ‘घर आयोग’ और इसके प्रतिवेदन के बाद भी गतिरोध जारी रहने पर जेवीपी समिति का गठन किया।

(i) संविधान सभा द्वारा गठित विभिन्न आयोग / समिति :
(A).धर आयोग :
भाषाई प्रांत आयोग (जिसे धर आयोग भी कहा जाता है) का गठन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, एस. के. धर की अध्यक्षता में 17 जून 1948 में किया गया था। इस आयोग को भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की व्यावहारिकता की जांच करनी थी। धर आयोग ने 10 दिसंबर 1948 को प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में केवल भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन का समर्थन नहीं किया, उनके प्रस्ताव के अनुसार “यदि राज्य पुनर्गठन भाषा के आधार पर किया जाता है तो भारत को कई व्यापक मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है।” इस आयोग ने भौगोलिक निकटता, प्रशासनिक दक्षता, वित्तीय दक्षता और अन्य कारकों पर अधिक जोर दिया था। वस्तुत: धर आयोग ने भाषाई राज्यों के पुनर्गठन के मुद्दे पर प्रारंभिक विचार और चर्चा की नींव रखी।
आयोग के निर्णय से संविधान सभा में एक बड़ा वर्ग असहमत था। विभिन्न भाषाई क्षेत्रों से संबंधित कांग्रेसी यथा मराठी भाषी कांग्रेसी एक अलग महाराष्ट्र राज्य के, गुजराती भाषी कांग्रेसी एक अलग गुजरात राज्य के पक्षधर थे। इसी तरह की भावनाएं उन कांग्रेसी सदस्यों की भी थी जो तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषी थे। संविधान सभा के सदस्यों की भावनाओं के कारण एक नई समिति का गठन किया गया जिसे, जे.वी.पी. समिति कहा जाता है।

(B).जे.वी.पी. समिति :
भाषा के आधार पर राज्य निर्माण के लिए देश में सशक्त आंदोलन हो रहे थे, इन परिस्थितियों में, दिसंबर 1948 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैय्या की सदस्यता वाली एक समिति स्थापित की गई जिसे जे.वी.पी समिति कहा जाता है। इस समिति ने एस.के धर समिति की सिफारिश की जांच की और अप्रैल 1949 के महीने में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस समिति के अनुसार, भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन देश की संभावनाओं के लिए अच्छा नहीं है। इस प्रकार, इस समिति ने भी भाषा के आधार पर राज्य पुनर्गठन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया तथा आर्थिक समृद्धि और राष्ट्र की एकता के आधार पर राज्य पुनर्गठन का समर्थन किया। इस समिति ने यह भी सिफारिश की कि नए प्रांतों के गठन को विलंबित किया जाना चाहिए, जिससे विभिन्न उभरते मुद्दों को सुलझाया जा सके।

(C).संविधान सभा द्वारा प्रस्तावित देशी रियासतों और ब्रिटिश प्रांतों का राज्यों में पुनर्गठन :

26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान में भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य और राज्यों का संघ” घोषित किया गया। 1947 से लेकर 1950 के मध्य देशी रियासतों को राजनीतिक एवं क्षेत्रीय रूप से भारतीय संघ में एकीकृत अर्थात विलय किए जाने की इस प्रक्रिया के अंतर्गत कुछ रियासतों को मौजूदा प्रांतों में मिला दिया गया तथा अन्य को संघों में संगठित किया गया था, जैसे कि राजपूताना, हिमाचल प्रदेश, मध्य भारत और विंध्य प्रदेश, कई रियासतों को संयुक्त कर बने थे। जबकि मैसूर, हैदराबाद, भोपाल और बिलासपुर सहित कुछ अन्य देशी रियासतों को अलग राज्य बनाया गया।

(ii) संविधान में तीन मुख्य प्रकार के राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रावधान किया गया था –

•Part A राज्य – जो ब्रिटिश भारत में गवर्नर द्वारा प्रशासित प्रांत थे, उनमें संविधान द्वारा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त गवर्नर और निर्वाचित राज्य विधानमंडल द्वारा शासन की व्यवस्था की गई। इस व्यवस्था में शामिल नौ राज्य – असम, बिहार, बॉम्बे, मध्य प्रदेश (पूर्व में मध्य प्रांत और बरार), मद्रास, ओडिशा (पूर्व में उड़ीसा), पंजाब (पूर्व में पूर्वी पंजाब), उत्तर प्रदेश (पूर्व में संयुक्त प्रांत) और पश्चिम बंगाल थे।

•Part B राज्य – ऐसे राज्य पूर्व रियासतें या रियासतों के संघ थे। इनका शासक एक राजप्रमुख (जो आमतौर पर एक घटक राज्य का शासक) होता था। राज्य में एक निर्वाचित विधायिका होती थी। राजप्रमुख की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी। ऐसे आठ
Part B राज्य – हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (PEPSU), राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावणकोर-कोचीन थे।

•.Part C राज्य – इस वर्ग में ब्रिटिश भारत में मुख्य आयुक्तों द्वारा शासित प्रांत और कुछ रियासतें शामिल थीं, और प्रत्येक राज्य का शासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त मुख्य आयुक्त द्वारा किया जाता था। Part C, के दस राज्य – अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश थे।

•.Part D क्षेत्र में शामिल एकमात्र क्षेत्र,अंडमान और निकोबार द्वीप समूह था, जिसका प्रशासन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा किया जाता था।

(iii). हैदराबाद-कर्नाटक की मुक्ति :
कन्नड़ भाषी क्षेत्र भी देश के बाकी हिस्सों के साथ 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गए थे, लेकिन कुछ भू-भाग, जो हैदराबाद के निज़ाम के शासन के अधीन थे, स्वतंत्र नहीं हुए क्योंकि निज़ाम ने भारत में विलय से इनकार कर दिया था। हैदराबाद में कर्नाटक राज्य के उत्तर-पूर्वी ज़िले बीदर, कलबुर्गी और रायचूर का एक बड़ा हिस्सा शामिल था। इन क्षेत्रों में रहने वाले लिंगायत अल्पसंख्यक भी बड़े पैमाने पर मानते थे कि उनकी उपेक्षा की गई है और वे निज़ाम और रजाकारों के धर्म के आधार पर किए जा रहे उत्पीड़न से पीड़ित थे। निज़ाम के खिलाफ ‘पुलिस कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो)’ के बाद, हैदराबाद प्रांत और उसके नागरिक 17 सितंबर 1948 को स्वतंत्र हो गए। इस दिन को कर्नाटक सरकार ‘हैदराबाद-कर्नाटक मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाती है।

(iv). राज्यों की सीमा में परिवर्तन :
1950-1956 की अवधि के दौरान कुछ राज्यों की सीमाओं में कुछ छोटे परिवर्तन सरकार द्वारा किए गए, यथा –
1.1 जुलाई 1954 को बिलासपुर के छोटे राज्य को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया।
2.चन्द्रनगर, जो कि फ्रांसीसी भारत का एक पूर्व परिक्षेत्र (Enclave) था, 1955 में पश्चिम बंगाल में शामिल कर दिया गया।

(4). भाषाई राज्यों के लिए आंदोलन :

स्वतंत्र भारत में भाषाई आधार पर नए राज्यों के निर्माण के लिए कई सशक्त आंदोलन हो रहे थे। तेलुगु और कन्नड़ भाषी राज्य के साथ ही बंबई शहर किस भाषाई राज्य को मिलेगा इसके लिए भारत में सशक्त आंदोलन हुए, जिनमें हिंसात्मक गतिविधियां, आमरण अनशन और सरकार की दमनात्मक कारवाई भी शामिल थी।

(A). तेलुगु भाषी राज्य के लिए आंदोलन :

आजादी के बाद तेलुगु भाषी लोगों ने कांग्रेस से भाषाई राज्य बनाने संबंधी पुराने संकल्प को पूर्ण करने की मांग की। उन्होंने इसके लिए आवेदन देना ,प्रतिनिधिमंडल भेजना, प्रदर्शन करना और भूख-हड़ताल का सहारा लिया। कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता भी इस मांग के समर्थक थे। मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री टी प्रकाशम ने सन 1950 में तेलुगु भाषी राज्य के मुद्दे पर पार्टी से इस्तीफा दे दिया तथा दलगत भावनाओं से ऊपर उठाते हुए मद्रास विधानसभा के तेलुगु भाषी विधायकों ने तेलुगु भाषी इलाकों को अलग राज्य के तौर पर गठित करने की मांग की। सन 1951 में कांग्रेसी नेता से स्वामी बने सीताराम नाम के एक नेता ने राज्य की मांग को लेकर 5 सप्ताह तक अनशन किय। उन्होंने गांधीवादी नेता विनोबा भावे की अपील पर भूख हड़ताल को खत्म किया।

आंध्र राज्य की मांग के मुद्दे ने 1951-52 के पहले आम चुनाव में तेलुगु भाषी क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के दौरान जवाहरलाल नेहरू को कई जगह विरोध प्रदर्शन और हमें आंध्र चाहिए जैसे नारे का सामना करना पड़ा। दूसरे कई जगहों पर भारी जीत के बावजूद कांग्रेस उन इलाकों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई । मद्रास विधानसभा के लिए तेलुगु भाषी क्षेत्रों में 145 विधायकों का चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस को महज 43 सीटों पर कामयाबी मिली वहां की ज्यादातर सीटें उन उम्मीदवारों के खाते में चली गई जो आंध्र आंदोलन का समर्थन कर रहे थे इसमें कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी, जिसने प्रभावशाली रूप से 41 सीटो पर जीत दर्ज की थी।
चुनाव के नतीजे ने आंध्र प्रदेश के लिए हो रहे आंदोलन को जबरदस्त प्रोत्साहित किया। फरवरी 1952 के आखिर में स्वामी सीताराम ने मद्रास विधानसभा के तेलुगु भाषी विधायकों से अपील की सदन की कार्यवाही का तब तक बहिष्कार करें जब तक उनके अलग राज्य की मांग को पूरा ना किया जाए। वस्तुत: आंदोलनकारी प्रधानमंत्री नेहरू और मद्रास के मुख्यमंत्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी दोनों से नाराज थे क्योंकि दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह एक अलग आंध्र प्रदेश के विचार को नहीं मानते और अगर राज्य का निर्माण हो भी जाता है तो मद्रास शहर आंध्र प्रदेश को नहीं मिलेगा। तेलुगु भाषी लोगों की मद्रास शहर में एक मजबूत जनसांख्यिकी और आर्थिक उपस्थिति थी इसलिए वे मानते थे कि शहर पर उनका तमिलों की तरह अधिकार है।

1952 में तेलुगु भाषी लोगों के हितों की रक्षा के लिए, ‘पोट्टी श्रीरामुलु’ नामक व्यक्ति ने मद्रास राज्य के तेलुगू भाषी जिलों – रायलसीमा और तटीय आंध्र, को मद्रास राज्य से अलग करके आंध्र राज्य बनाने की जनता की मांगों के लिए आमरण अनशन किया। श्रीरामुलु 56 दिनों तक भूख हड़ताल पर रह चुके थे।, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा आंध्र राज्य बनाने का वादा करने पर उन्होंने अपना उपवास खत्म किया।
बाद में, आंध्र राज्य के निर्माण की दिशा में कोई वास्तविक प्रगति न देखकर,19 अक्टूबर 1952 को मद्रास में ‘महर्षि बुलुसु संबमूर्ति के घर में उन्होंने पुनः उपवास शुरू कर दिया। आंध्र कांग्रेस द्वारा उपवास को समर्थन नहीं देने के बावजूद इसे व्यापक जनसमर्थन मिला । तेलुगु लोगों द्वारा कई हड़तालों और प्रदर्शनों के बावजूद, सरकार ने नए राज्य के गठन के बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया। 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद ‘पोट्टी श्रीरामुलु’ की,15 दिसंबर की आधी रात (यानी, 16 दिसंबर 1952 की सुबह), उपवास के दौरान मृत्यु हो गई।

श्रीरामुलु की शव यात्रा में अपार जनसमूह ने उनके बलिदान की प्रशंसा में नारे लगाए। बाद में, जनसमूह हिंसक हो गया और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना शुरू कर दिया गया। यह खबर तेज़ी से फैली और चिराला, श्रीकाकुलम, विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, राजमुंदरी, एलुरु, भीमावरम, बल्लारी, गुंटूर, तेनाली, ओंगोल और नेल्लोर जैसे दूरदराज के इलाकों में भी हिंसात्मक प्रदर्शन हुए। अनकापल्ले और विजयवाड़ा में पुलिस के साथ झड़पों में सात लोग मारे गए।
तीन से चार दिनों तक जारी रहे इस जन आंदोलन ने मद्रास और आंध्र क्षेत्रों में सामान्य जीवन को बाधित कर दिया। 19 दिसंबर 1952 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य के गठन की घोषणा की।

(i). आंध्र राज्य अधिनियम :
संसद ने सितंबर 1953 में आंध्र राज्य अधिनियम पारित किया जिसके तहत,1 अक्टूबर 1953 को, मद्रास राज्य के उत्तर में स्थित तेलुगु-भाषी 11 जिले नए आंध्र राज्य (आधिकारिक नाम State of Andhra Pradesh) बन गए, जिसकी राजधानी कुरनूल थी। तंगुतुरी प्रकाशम पंतुलु (जिन्हें आंध्र केसरी – “आंध्र का शेर” भी कहा जाता है) नए राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। राज्य सरकार द्वारा, जिस घर में पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु हुई, उसे एक स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है। प्रथम “भाषाई राज्य” के निर्माण ने और अधिक राज्यों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया
आंध्र राज्य का तेलुगु भाषी क्षेत्र 1 अक्टूबर 1953 को मद्रास राज्य से अलग किया गया था, जिसकी राजधानी कुरनूल थी। इस आंध्र राज्य में देसी रियासत हैदराबाद के तेलुगु भाषी क्षेत्र रायलसीमा और मद्रास राज्य के तटीय तेलुगु भाषी जिलों को शामिल नहीं किया गया था।

(B). समस्त तेलुगु भाषाई क्षेत्रों के गठन का ‘विशालांध्र राज्य’ आंदोलन –
विशालांध्र, स्वतंत्रता के बाद भारत में सभी तेलुगु भाषाई क्षेत्रों का एक संयुक्त राज्य रूप में गठन के लिए एक आंदोलन था। हैदराबाद के निज़ाम के नेतृत्व वाली देसी रियासत, ‘हैदराबाद’ का 1948 सितम्बर में ‘ऑपरेशन पोलो’ द्वारा भारत में विलय हैदराबाद स्टेट (1948-56) के रूप में हुआ, जिसे तेलंगाना भी कहा के तेलुगु भाषी जनता के समक्ष यह प्रश्न था की क्या उन्हें मद्रास राज्य के तेलुगु भाषाई ज़िलों को मिलाकर बने नए आंध्र राज्य में शामिल होना चाहिए। इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से,कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने आंध्र महासभा के बैनर तले किया था,जिसका उद्देश्य हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों (तेलंगाना) और मद्रास प्रेसीडेंसी के आंध्र क्षेत्रों को एकीकृत करना था।

26 जनवरी 1950 को एक प्रशासनिक अधिकारी,:एम. के. वेलोडी’ को हैदराबाद राज्य का पहला मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने मद्रास राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को नियुक्त कर, हैदराबाद रियासत के नियमों से पूरी तरह से अलग ब्रिटिश प्रशासनिक प्रणाली का उपयोग किया तथा राज्य की आधिकारिक भाषा उर्दू से अंग्रेजी में बदल दी गई।
1952 में, बरगुला रामकृष्ण राव हैदराबाद राज्य के पहले सार्वजनिक चुनाव में मुख्यमंत्री चुने गए। इस दौरान, मद्रास राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को वापस भेजने और हैदराबाद के मूल निवासियों (मुल्कियों) का शासन लागू करने के लिए तेलंगाना के कुछ मूल निवासियों ने हिंसक आंदोलन किए। हैदराबाद राज्य के निज़ाम शासित हैदराबाद रियासत के मूल निवासियों को (धर्म/जाति के विभेद के बिना) “मुल्की” (गांव का आदमी) कहा जाता था। मुल्की नियमों के तहत सिर्फ़ स्थानीय निवासी (मुल्की) ही सरकारी पदों पर नियुक्त हो सकते थे थे, और इसके लिए 15 साल से रियासत का मूल निवासी रहना ज़रूरी था। इन नियमों का मकसद स्थानीय रोज़गार के अधिकारों की रक्षा करना था, लेकिन नवगठित हैदराबाद स्टेट में अन्य प्रदेशों को योग्य व्यक्तियों को राज्य में नियुक्त करने से 1952 में बड़ा विरोध प्रदर्शन छात्रों द्वारा हुआ। इसके बाद डॉ. बरगुला रामकृष्ण राव ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और सैयद आलम शरजील हैदराबाद के मुख्यमंत्री चुने गए।

इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से,कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने आंध्र महासभा के बैनर तले किया था,जिसका उद्देश्य हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों (तेलंगाना) और मद्रास प्रेसीडेंसी के आंध्र क्षेत्रों को एकीकृत करना था।

(C). कर्नाटक एकीकरण आंदोलन :
जनवरी 1953 में, हैदराबाद में हुए कांग्रेस अधिवेशन में, आंध्र प्रदेश के निर्माण के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया गया लेकिन कर्नाटक के निर्माण के पक्ष में नहीं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और बॉम्बे विधानसभा के सदस्य ए.जे दोड्डामेटी (Andanappa Jnanappa Doddameti) ने तुरंत अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और धारवाड़ के जक्कली में भूख हड़ताल शुरू कर दी। इसे व्यापक जन समर्थन मिला तथा हुबली में हुए दंगों में कई लोग घायल हुए और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस घटना के बाद हुए हुबली-धारवाड़ उपचुनावों में कांग्रेस की हार हुई, जबकि कर्नाटक एकीकरण पक्ष के उम्मीदवार ने भारी जीत हासिल की।

(5). राज्य पुनर्गठन आयोग :
अंततः प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1953 में भारतीय राज्यों को पुनर्गठित करने के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की। आयोग को निर्देशित किया गया कि वे भाषाई समस्या के समाधान और व्यापक सिद्धांतों के आधार पर राज्यों के गठन की अनुशंसा करें। राज्य पुनर्गठन आयोग के तीन सदस्यों में से एक फजल अली न्यायाधीश थे जबकि दूसरे के.एम. पणिक्कर एक इतिहासकार और नौकरशाह थे और एच.एन. कुंजरू सामाजिक कार्यकर्ता थे। इनमें से कोई भी औपचारिक रूप से कांग्रेस से संबंधित नहीं था ।
1954-55 के मध्य आयोग के सदस्यों ने पूरे देश का दौरा किया उन्होंने 104 शहरों और कस्बों का दौरा किया और करीब 8000 लोगों से बातचीत की। आयोग को राज्यों के गठन के संबंध में 13250 आवेदन प्राप्त हुए।

इसी समय, मैसूर सरकार ने एम. शेषाद्रि की अध्यक्षता में एक तथ्य-खोज समिति नियुक्त की, मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया जैसे मैसूरवासियों के भारी समर्थन कन्नड़ भाषी राज्य निर्माण के लिए था।
कांग्रेस नेता ‘गुडलप्पा हल्लिकेरी’, ने भाषाई जनसांख्यिकी के आधार पर एकीकरण की भावना को आगे बढ़ाया। उन्होंने राज्य चुनाव आयोग के समक्ष भी प्रतिनिधित्व किया और एकीकरण का आग्रह किया। राज्य चुनाव आयोग ने अंततः भाषाई जनसांख्यिकी के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की।

(A). राजधानी के तौर पर बम्बई के भविष्य का निर्धारण संबंधी विवाद :
राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न राजधानी के तौर पर बम्बई के भविष्य का निर्धारण था। इसमें दो प्रमुख पक्ष थे – बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने की पक्षधर बंबई सिटिजन कमेटी तथा बंबई को मराठी भाषी प्रदेश की राजधानी बनाने की समर्थक संयुक्त महाराष्ट्र परिषद।

(i). बंबई सिटिजन कमेटी :
इस कमेटी के अगुवाई कपास के मशहूर कारोबारी और उद्योगपति सर पुरुषोत्तम दास ठाकुरता और जे.आर.डी. टाटा जैसे उद्योगपति कर रहे थे। अपनी मांग को मजबूती से रखने के लिए उन्होंने 200 पन्नों के पुस्तिका छपाई जो विवरणों, मानचित्रों और सारणियों से भरी हुई थी। इस पुस्तिका में पहला अध्याय शहर के निर्माण बहुभाषी समुदायों के योगदान के इतिहास से संबंधित था। 19वीं सदी से पहले शहर में मराठी भाषी लोगों का आगमन बहुत ही काम हुआ था और अभी शहर में उनकी आबादी महज 40 फीसदी थी। दूसरे अध्याय में इसके आर्थिक पक्ष का उदाहरण दिया गया तथा देश के उद्योग वित्त और विदेशी व्यापार का प्रमुख केंद्र होने के कारण भाषा को इसके किसी राज्य से संबद्धता का आधार नहीं माने जाने पर बल दिया गया था।
तीसरा और चौथा अध्याय सामाजिक विषयों से संबंधित था जिसमें शहर के बहुभाषी और बहु सांस्कृतिक चरित्र का वर्णन किया गया था।शहर के भूगोल से संबंधित पांचवें अध्याय में कहा गया कि बम्बई के एक तरफ समुद्र है जबकि दूसरी तरफ पहाड़िया जिससे यह मराठी भाषी इलाकों से अलग है। मुंबई में सबसे पहले बसने वालों में यूरोपियन समुदाय के लोग थे तथा मुख्य व्यापारी और पूंजीपति गुजराती और पारसी समुदाय के लोग थे। इस शहर को गैर मराठियों ने बसाया था, कामकाजी वर्ग में भी मराठी भाषी लोगों से ज्यादा उत्तर भारतीयों और ईसाइयों की बहुलता थी। मुंबई सिटीजन कमेटी के मुताबिक यह तथ्य स्पष्ट था कि भूगोल, इतिहास,भाषा, जनसंख्या और कानून व्यवस्था के आधार पर मुंबई और उत्तरी कोकण को मराठी भाषी प्रदेश का हिस्सा नहीं माना जा सकता जैसा की संयुक्त महाराष्ट्र के पक्षधर दावा कर रहे थे।
इस अभियान को समर्थन दे रहा एक अन्य वर्ग गुजरातियों का था। यदि बंबई वृहत महाराष्ट्र की राजधानी बन जाती तो वहां के ज्यादातर राजनेता और मंत्री मराठी भाषी होते इस संभावना से गुजराती भाषी लोग सशंकित थे, अत: यह वर्ग मुंबई सिटीजन कमेटी को तन और धन से समर्थन दे रहा था।

(ii). संयुक्त महाराष्ट्र परिषद :
1946 से ही संयुक्त महाराष्ट्र परिषद नाम की एक संस्था भी अस्तित्व में थी जिसमें महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे। यह सभा मराठी भाषी राज्य और बंबई को इसकी राजधानी बनाने के लिए गठित की गई थी
संयुक्त महाराष्ट्र परिषद के अध्यक्ष कांग्रेसी नेता शंकर राय देव थे और इसके मुख्य सिद्धांतकार कैंब्रिज में पढ़े हुए मशहूर अर्थशास्त्री डी. आर.गाडगिल थे। इस विषय पर अधिक दृढ़ प्रतिज्ञ दूसरे सिद्धांतकार जी. वी.देशमुख थे।

संयुक्त महाराष्ट्र परिषद ने 100 पृष्ठों का एक प्रभावशाली दस्तावेज तैयार किया। इस दस्तावेज में पहले हिस्से में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का सैद्धांतिक बचाव कर इसे देश में संघात्मक प्रणाली के सशक्तिकरण और समान भाषा को प्रशासनिक इकाइयों के सुविधा पूर्ण संचालन से जोड़ा। इसमें उल्लेखित किया गया कि पूरे मराठी भाषाई इलाके में समाज का चरित्र लगभग उल्लेखनीय रूप से एक समान है, यथा – लोक-गीत, लोक- कथाएं, जातियों की संरचना, देवी-देवता एक ही जैसे हैं और लोग एक ही जैसे संतों के प्रति आस्था रखते हैं। मराठी भाषी लोग तीन राजनीतिक इकाइयों हैदराबाद, मुंबई उत्तर और केंद्रीय प्रांत में बिखरे पड़े हैं जो की एक ऐतिहासिक दुर्घटना के तौर पर थी और इसे तत्काल दूर करने के लिए एक नए महाराष्ट्र राज्य और बम्बई को उसकी राजधानी के तौर पर स्थापित करने की आवश्यकता है क्योंकि जिस जमीन पर यह द्वीप शहर बसा हुआ है वह बहुत पहले से मराठी भाषी लोगों द्वारा बसी हुई है। मुंबई के पश्चिम में समुद्र है जबकि इसके उत्तर दक्षिण और पूर्व में मराठी भाषी लोगों की बहुलता है। यह शहर मराठी प्रेस, मराठी प्रकाशनों और मराठी संस्कृति का केंद्र है। आर्थिक रूप से बम्बई पूरी तरह से अपनी मराठी पृष्ठभूमि के इलाकों पर निर्भर है। यह वहां से अधिकांश सस्ता श्रम, बिजली और पानी की आपूर्ति पाता है। इसके तमाम संचार के साधन महाराष्ट्र से होकर गुजरते हैं इसलिए ऐसा सोचना भी अकल्पनीय है कि बम्बई को राजधानी बनाए बिना महाराष्ट्र प्रांत का गठन किया जाए।

इस तर्क के जवाब में के शहर में मराठी भाषी लोगों का बहुमत नहीं है परिषद ने कहा कि इस शहर में किसी भी अन्य भाषा बोलने वाले की तुलना में मराठी बोलने वाले ज्यादा है वैसे भी इस महान बंदरगाह शहर के स्वभाव में ऐसा है कि यह बहुभाषी शहर है । परिषद ने तर्क दिया कि बर्मा की राजधानी में सिर्फ 32 फ़ीसदी लोग बर्मा की राष्ट्रभाषा बोलते हैं लेकिन फिर भी किसी की हिम्मत नहीं है कि वह कहे की बर्मा को एक गैर बर्मी क्षेत्र बना दिया जाए। बंबई मराठी भाषी जिलों से घिरा है इसलिए इसे अवश्य ही नए राज्य की राजधानी होनी चाहिए। परिषद ने चेतावनी दी कि अगर ऐसी कोशिश की गई तो महाराष्ट्र प्रांत का सुचारू रूप से काम करना और वहां कोई भी कामकाज करना असंभव हो जाएगा।

(B). राज्य पुनर्गठन आयोग का प्रतिवेदन :
राज्य पुनर्गठन आयोग ने 30 सितंबर 1955 को भारत के राज्यों के पुनर्गठन के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसमें भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए गए। आयोग ने कहा कि किसी भी राज्य की भाषा सामान्यत: प्रशासनिक सुविधा और साक्षमता के लिए महत्वपूर्ण सकारात्मक वजह है लेकिन दूसरे अन्य तत्व और वजहों (निश्चित रूप से देश की एकता और सुरक्षा) को नजरअंदाज करके सिर्फ भाषा को ही एकमात्र कारक और लोगों को जोड़ने वाला सिद्धांत मानना उचित नहीं।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपने प्रतिवेदन के अगले 19 अध्यायों में विशेष प्रस्तावों को रेखांकित किया गया था। दक्षिण के राज्यों का जहां तक सवाल था वहां बोले जाने वाली मुख्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़, तमिल और मलयालम के आधार पर इलाके का पुनर्गठन करना आसान प्रतीत हुआ। जिला और तालुका को अलग-अलग भाषाएं बोलने वालों के बहुमत के आधार पर पुनर्गठित कर दिया गया। अब ब्रिटिश जमाने के मिले-जुले इलाके के जगह चार संगठित प्रांत थे। जहां तक उत्तर भारत का सवाल था तो राज्य पुनर्गठन आयोग ने विशाल हिंदी पट्टी में चार राज्यों के निर्माण का अनुमोदन किया यह राज्य थे – बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान। पूर्वी भारत में मौजूद राज्यों की सीमाओं में कुछ बदलाव के साथ वैसे ही रहने दिया गया।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने [The States Reorganisation Commission (SRC)] ने हैदराबाद रियासत के मराठी भाषी क्षेत्र को बॉम्बे राज्य के साथ और कन्नड़ भाषी क्षेत्र को मैसूर राज्य के साथ मिलाने की सिफारिश की तथा आयोग ने, हैदराबाद रियासत के तेलुगु भाषी तेलंगाना क्षेत्र को आंध्र राज्य में विलय के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन कर प्रतिवेदन के अनुच्छेद 374 और 378 में क्रमश: कहा गया था कि “विशालांध्र का निर्माण एक ऐसा आदर्श है जिससे आंध्र और तेलंगाना दोनों जगह के कई लोग और सार्वजनिक संगठन लंबे समय से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं, और जब तक इसके विपरीत कोई ठोस कारण न हो, इस भावना पर विचार किया जाना चाहिए”।
SRC प्रतिवेदन के अनुच्छेद 378 में कहा गया, “विशाल आंध्र के विरोध का एक मुख्य कारण तेलंगाना के शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों को यह डर भी लगता है कि तटीय इलाकों के ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग उन्हें दबा देंगे और उनका शोषण करेंगे।”

अंतिम विश्लेषण में SRC ने तुरंत विलय के विरुद्ध सिफारिश की। अनुच्छेद 386 में उल्लेखित था कि,“यह आंध्र और तेलंगाना दोनों के हित में होगा, की अभी तेलंगाना क्षेत्र को एक अलग राज्य बना दिया जाए, जिसे हैदराबाद राज्य के नाम से जाना जा सकता है, और 1961 या उसके आस-पास होने वाले आम चुनावों के बाद अगर शेष हैदराबाद राज्य (तेलंगाना) की विधायिका दो-तिहाई बहुमत से ऐसे एकीकरण के पक्ष में अपनी राय व्यक्त करती है तो इसे आंध्र प्रदेश के साथ एकीकृत किया जा सकता है।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने बिहार और असम के जनजाति बहुल क्षेत्रों को अलग आदिवासी प्रांत बनाने और एक अलग सिख प्रांत के गठन को भी मान्यता नहीं दी थी, साथ ही इसने आंध्र प्रदेश को मद्रास शहर देने की अनुशंसा भी नहीं की लेकिन आयोग का सबसे विवादास्पद प्रस्ताव यह था कि उसने एक संयुक्त महाराष्ट्र के मांग का अनुमोदन नहीं किया इसकी जगह आयोग ने मराठी भाषी सुदूरवर्ती जिलों को मिलाकर एक विदर्भ प्रांत के गठन का अनुमोदन किया। मुंबई को पहले की तरह ही गुजरातियों और मराठियों का द्विभासी सूबा बने रहने देने का अनुमोदन किया गया। आयोग ने कहा कि उन्होंने “संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के भावनाओं का आदर किया है लेकिन वे दूसरे समुदायों के लोगों की भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकते।”
नवंबर 1955 को संसद में राज्य पुनर्गठन आयोग के विभिन्न अनुमोदनों के साथ इस पर बहस हुई कि मुंबई को द्विभाषी सूबा की राजधानी बनाकर रखा जाए या नहीं।

•बम्बई के भविष्य के लिए संसदीय बहस और आंदोलन ;

15 नवंबर 1955 को संसद में राज्य पुनर्गठन आयोग के इस अनुमोदन पर बहस हुई कि मुंबई को द्विभाषी सूबा की राजधानी बनाकर रखा जाए या नहीं।
रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक “भारत गांधी के बाद” में लिखा है – “मुंबई के सांसद एस.के. पाटिल की राय में मुंबई को एक नगर राज्य का दर्जा मिलना चाहिए था। उन्होंने यह तर्क दिया कि संभावित नगर राज्य में हर एक मायने में महानगरी और सांस्कृतिक बहुलता वाली आबादी रहती है।अगर मुंबई को अपने ऊपर प्रशासन करने की आजादी दी गई तो वह एक विश्व स्तरीय लघु भारत का रूप और सभ्यताओं की एक प्रयोगशाला प्रस्तुत करेगी जो एक नई सभ्यता को जन्म देगी।
पूना शहर से कांग्रेस के सांसद एन. बी. गाडगिल ने कहा कि वे समझौते के पक्ष में तैयार हैं लेकिन समझौते की एक सीमा होती है और यह सीमा यह है कि कोई भी अपने आत्मसम्मान की कीमत पर समझौता नहीं करेगा कोई भी औरत अपनी इज्जत का समझौता नहीं करेगी और कोई भी देश अपने स्वतंत्रता की कीमत पर समझौता नहीं करेगा। गाडगिल ने कहा सिर्फ इस मामले को छोड़ कर अन्य जगह भाषाई सिद्धांत को स्वीकार किया गया है। आयोग की रिपोर्ट से मराठी भाषी लोगों में बहुत नाराजगी है। विरोध में की जा रही सभाओं से यह बात साफ हो जानी चाहिए थी की एक संयुक्त महाराष्ट्र और राजधानी के तौर पर मुंबई के अलावा इसका कोई समाधान स्वीकार्य नहीं होगा गाडगिल ने चेतावनी दी कि अगर जन भावनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो बम्बई का भविष्य बम्बई की गलियों में तय किया जाएगा।”

“राज्य पुनर्गठन आयोग ने मराठियों से आग्रह किया कि वह राष्ट्रीय एकता के नाम पर मुंबई की क्षति को स्वीकार कर ले ।गाडगिल ने कहा कि डेढ़ सौ सालो से लगातार महाराष्ट्र के लोगों ने निस्वार्थ भाव से देश की एकता को बढ़ावा देने का काम किया है। मराठी भाषी लोगों ने देश में सबसे पहला विश्वविद्यालय और स्कूल खोला और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन में मदद की।अंग्रेजों के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयों में मराठी भाषी लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। जब 20वीं सदी की शुरुआत में कांग्रेस पार्टी लड़खड़ा रही थी तो वे लोग ही थे जिन्होंने पार्टी को नवजीवन प्रदान किया। जिन लोगों ने नए सिद्धांतों और दर्शनों को जन्म दिया। यह लोकमान्य तिलक थे जिनके बदौलत ऐसा संभव हो पाया। उनके द्वारा चलाए गए होमरूल आंदोलन और सन 1920 के राष्ट्रीय आंदोलन से मराठी लोग किसी से भी पीछे नहीं थे। वे इन आंदोलनों में अग्रणी भूमिका में थे। मैं महात्मा गांधी जैसे नेता का यहां हवाला देता हूं जिन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय आंदोलन में महाराष्ट्र कार्यकर्ताओं का सतत स्रोत है। आजाद भारत में भी एक महाराष्ट्रीयन विनोबा भावे ही महात्मा गांधी के विचारों और उनके झंडे को एक जगह से दूसरी जगह फैलाने का काम कर रहे हैं। गाडगिल ने आगे कहा कि मुंबई के प्रश्न पर मराठियों को देश की सुरक्षा, एकता और हितों के लिए उपदेश पिलाया जा रहा है। गाडगिल का भाषण अपने आप में एक प्रभावशाली भाषण था उनके भाषण के आखिरी पंक्ति थी जिसमें उन्होंने कहा था कि उनसे हमसे देश सेवा के लिए कहना वैसा ही है जैसे चंदन से सुगंध देने को कहा जाए।गाडगिल ने चेतावनी दी कि इसका समाधान न होने की सूरत में संसद में बहस की बजाय सड़कों पर उतरा जाएगा।” रामचंद्र गुहा -भारत गांधी के बाद)

कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता एस.ए. डांगे, बी आर अंबेडकर, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी भी संयुक्त महाराष्ट्र समिति के पक्ष भी थी। बड़ी संख्या में असंतुष्ट कांग्रेसी भी इस विरोध में शामिल थे। विविध वर्गों और दलों की व्यापक भागीदारी के कारण संयुक्त महाराष्ट्र परिषद का नाम बदलकर संयुक्त महाराष्ट्र समिति कर दिया गया क्योंकि समिति पूरे समाज को प्रतिबिंबित करती थी, जिससे जनता के सहयोग और सहभागिता परिलक्षित होती थी।

16 जनवरी की सुबह को बम्बई पुलिस ने आंदोलन की आशंका के कारण नवगठित ऑल पार्टी एक्शन कमेटी और संयुक्त महाराष्ट्र के नेताओं और आंदोलनकारी के घरों पर छापा मारा पुलिस ने करीब 400 लोगों को गिरफ्तार किया गिरफ्तारी के बाद 18 तारीख को एक आम हड़ताल का आयोजन हुआ जिसमें दुकान, कारखाने बंद रहे तथा रेल गाड़ियां तक नहीं चली। सड़कों पर जुलूस निकाले गए तथा नेहरू और मुंबई के गुजराती भाषी मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई का पुतला दहन किया गया। इसके दो दिन पहले 16 तारीख को दोपहर में पुलिस और आंदोलनकारी में झड़प हुई। लोगों की भीड़ तोड़फोड़ पर उतारू हो गई दुकान और ऑफिसों को लूटा जाने लगा करीब एक सप्ताह तक इस आंदोलन का असर रहा। पुलिस को तैनात किया गया लेकिन शांति आने तक करीब दर्जन भर से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे और अरबों की संपत्ति बर्बाद हो गई। (भारत गांधी के बाद – रामचंद्र गुहा)

जनवरी के तीसरे सप्ताह में अमृतसर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में मुंबई हिंसा की आलोचना की गई।

इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नेहरू के समर्थकों में गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत और मुंबई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई शामिल थे। मोरारजी देसाई ने कहा कि आंदोलन कर्ताओं का उद्देश्य सही मायने में सरकार का सत्ता पलट और बलपूर्वक शहर पर कब्जा करना और शहर के गैर मराठी तत्वों को आतंकित करना जिससे बंबई को महाराष्ट्र को सौंप दिया जाए।” देसाई के इस बयान के विरोध में गाडगिल ने नेहरू और गृहमंत्री पंत को पत्र लिखा की प्रशासन ने जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त की पुलिस ने जिस तरह लाठियां और गोलियां चलाई हैं उसे देखकर पूर्व ब्रिटिश प्रशासन को भी शर्म आ जाएगी। गाडगिल ने कहा की सन 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण जनसभा को सरकार के खिलाफ विद्रोह करार दिया गया ताकि जनरल डायर के नरसंहार को जायज ठहराया जा सके इस तरह से मोरारजी देसाई मुंबई के विरोध प्रदर्शनों को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे हैं ताकि पुलिसिया दमन की कार्रवाई को सही ठहराया जा सके। गाडगिल ने लिखा कि जब मोरारजी और महाराष्ट्र में से एक को चुनने की बारी थी तो केंद्र ने इस आधार पर मोरारजी का चुनाव किया की वह बढ़िया तरीके से गोली चलवा सकते हैं, वह अच्छे प्रशासक हैं लेकिन पार्टी को इसका बुरा अंजाम भुगतना होगा क्योंकि मुंबई और अन्य जगहों पर पुलिस की भेदभावपूर्ण ढंग से गोलीबारी और अन्य दूसरे अत्याचारों ने मराठी लोगों का कांग्रेस और भारत सरकार से मोहभंग कर दिया है।’ (भारत गांधी के बाद रामचंद्र गुहा)

“लगभग हर एक मराठी की जुबान पर नारा था लाठी गोली खाएंगे फिर भी मुंबई लेंगेम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुंबई के कई श्रमिक कामगार बहुल इलाकों में काले झंडे लगाए गए। नेहरू ने फरवरी में मुंबई का दौरा करने का फैसला किया तो संयुक्त महाराष्ट्र समिति ने 100000 बच्चों द्वारा हस्ताक्षरित एक आवेदन तैयार किया जिसे नेहरू को सौपा जाना था। इस पर लिखा था “चाचा नेहरू हमें मुंबई चाहिए।” नेहरू मुंबई आए लेकिन किसी से नहीं मिले।
जून 1956 में कांग्रेस का वार्षिक समारोह मुंबई में होना था हवाई अड्डे और पूरे रास्ते पर नेहरू का काले झंडों से स्वागत किया गया। समारोह के दूसरे दिन लोगों की एक भीड़ ने इसके सदस्यों पर पतराव किया इसमें कई लोग घायल हुए और पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। कांग्रेस पार्टी की महाराष्ट्र इकाई में खुला असंतोष फैल गया। दक्षिणी मुंबई की कोलाबा उपनगरीय सीट से सांसद और केंद्रीय वित्त मंत्री सी.डी. देशमुख ने मुंबई को महाराष्ट्र को ना सौंपे जाने के विरोध में मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया।” (भारत गांधी के बाद रामचंद्र गुहा)

•हैदराबाद स्टेट का आंध्र राज्य में विलय ;
14 सितंबर 1955 को राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन लोकसभा के पटल पर रखा गया। अपने प्रतिवेदन में आयोग ने विशालांध्र के गठन की मांग को भावनात्मक रूप से उचित मानते हुए भी शैक्षिक रूप से पिछड़े तेलंगाना क्षेत्र के लोगों में आंध्र राज्य में विलय से शोषण के भय को देखते हुए अंतिम विश्लेषण में SRC ने तुरंत विलय के खिलाफ सिफारिश की। अनुच्छेद 386 में उल्लेखित था कि,“यह आंध्र और तेलंगाना दोनों के हित में होगा, की अभी तेलंगाना इलाके को एक अलग राज्य बना दिया जाए, जिसे हैदराबाद राज्य के नाम से जाना जा सकता है, और जिसमें 1961 के आस-पास होने वाले आम चुनावों के बाद आंध्र राज्य के साथ उसके एकीकरण का प्रावधान हो, अगर शेष हैदराबाद राज्य (तेलंगाना) की विधायिका दो-तिहाई बहुमत से ऐसे एकीकरण के पक्ष में अपनी राय देती है।

3 दिसंबर 1955 को हैदराबाद असेंबली में 174 MLA में से 147 MLA ने अपनी राय दी। 103 MLA (मराठी और कन्नड़ MLA मिलाकर) ने विलय का पक्ष लिया, 16 MLA निष्पक्ष रहे और 29 ने विलय का विरोध किया।
तेलंगाना के MLA में से 25 तेलंगाना MLA विलय से सहमत नहीं थे, 59 तेलंगाना MLA ने इसका समर्थन किया। तेलंगाना विधानसभा के 94 MLA में से 36 कम्युनिस्ट (PDF), 40 कांग्रेस, 11 सोशलिस्ट पार्टी (SP) और 9 इंडिपेंडेंट थे।

1 नवम्बर 1956 को आंध्र प्रदेश राज्य बनाने के लिए तेलंगाना (हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्र) और आंध्र राज्य के विलय से कुछ महीने पहले हैदराबाद राज्य के मुख्यमंत्री, बरगुला रामकृष्ण राव का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष को पत्र लिख कर इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए थे। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने राजनीतिक समीकरणों के लिए विलय का समर्थन किया था और वे 1951 में विशेष परिस्थितियों में चुने गए थे और उस समय विशालांध्र कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं था।
मुख्यमंत्री राव ने भाषाई और सांस्कृतिक समानता, प्रशासनिक सुविधा, औद्योगिक विकास और भावनात्मक पक्ष को विशालांध्र के पक्ष में माना। उन्होंने तेलंगाना के एक वर्ग में निजाम शासन की प्रशासनिक एवं सामाजिक व्यवस्था तथा उर्दू भाषा का महत्व खत्म होने, तेलंगाना में व्याप्त शैक्षणिक (विशेषकर अंग्रेजी भाषा में) पिछड़ापन और आर्थिक शोषण के भय को विलय के विपक्ष में माना।

तेलंगाना का आंध्र राज्य में विलय करने के लिए, 20 फरवरी 1956 को तेलंगाना और आंध्र राज्य के नेताओं के बीच एक समझौता,’जेंटलमैन एग्रीमेंट (The Gentlemen’s agreement)’ हुआ। जिसमें तेलंगाना से भेदभाव को रोकने के लिए कई राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक प्रावधान किए गए थे।

•सज्जनों का समझौता (The Gentlemen’s agreement)
इस समझौते के मुख्य प्रावधान के अनुसार –
(A).राज्य का प्रशासनिक व्यय दोनों क्षेत्रों द्वारा आनुपातिक रूप से उठाया जाएगा और तेलंगाना क्षेत्र से प्राप्त होने वाला अतिरिक्त राजस्व सिर्फ तेलंगाना के विकास पर खर्च किया जाएगा।
(B). कुछ खास विषयों में सरकारी कार्य को ज़्यादा सुविधाजनक बनाने के लिए तेलंगाना इलाके को एक क्षेत्र माना जाएगा।
(C). तेलंगाना क्षेत्र के लिए राज्य विधानसभा की एक क्षेत्रीय स्थायी समिति होगी, जिसमें उस क्षेत्र के राज्य विधानसभा के सदस्य और मंत्री शामिल होंगे लेकिन मुख्यमंत्री शामिल नहीं होंगे।
कुछ विशेष विषयों से जुड़े कानून क्षेत्रीय समिति को भेजे जाएंगे। क्षेत्रीय समिति राज्य सरकार को कानून बनाने या सामान्य नीति के सवाल पर प्रस्ताव भी दे सकती है, जिसमें नियमित और आकस्मिक खर्चों के अलावा कोई वित्तीय प्रतिबद्धता शामिल न हो।
क्षेत्रीय समिति द्वारा दी गई सलाह को आम तौर पर सरकार और राज्य विधानमंडल स्वीकार करेंगे। मतभेद होने पर, मामला राज्यपाल के पास भेजा जाएगा, जिनका फैसला बाध्यकारी होगा।

(D).क्षेत्रीय समिति निम्नलिखित मामलों पर विचार करेगी:
i) राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए सामान्य विकास योजनाओं के ढांचे के भीतर विकास और आर्थिक योजना।
ii) स्थानीय स्वशासन या ग्राम प्रशासन के उद्देश्य से नगर निगमों, सुधार ट्रस्टों, जिला बोर्डों और जिला प्राधिकरणों की संवैधानिक शक्तियाँ।
iii) स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता
iv) प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा।
v) तेलंगाना क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश का विनियमन
vi) शराबबंदी
vii) कृषि भूमि की बिक्री
viii) कुटीर,लघु उद्योग, कृषि, सहकारी समितियाँ, बाज़ार और मेले।
इस व्यवस्था की दस साल बाद समीक्षा की जाएगी।

(E). अधिवासीय नियम (Domicile Rules) : अधीनस्थ सेवाओं (Subordinate services) में भर्ती के संदर्भ में तेलंगाना को एक इकाई माना जाएगा, इन सेवाओं के अंतर्गत आने वाले पद उन लोगों के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं जो मौजूदा हैदराबाद मुल्की नियमों (तेलंगाना इलाके में 15 साल का रहना और शपथ पत्र (Affidavit) जिसमें कहा गया हो कि वह तेलंगाना छोड़कर नहीं जाएगा/जाएगी)
के तहत बताई गईअधिवासीय शर्तों को पूरा करते हैं।

(F). उर्दू की स्थिति : भारत सरकार, राज्य सरकार को सलाह देगी कि यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य के प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे में उर्दू की मौजूदा स्थिति अगले पांच सालों तक बनी रहे।

(G). तेलंगाना के सभी शैक्षणिक संस्थानों को विकसित और तेलंगाना के विद्यार्थियों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए।

(H). हैदराबाद रियासत की शासनिक सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों को बिना किसी समीक्षा के आंध्र प्रदेश की सेवाओं मे शामिल कर लिया जाए। हालाँकि, अगर कोई छंटनी ज़रूरी पाई जाती है, तो बड़े राज्य की सेवाओं के सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा।

(I). कैबिनेट में आंध्र और तेलंगाना के सदस्यों का अनुपात 60:40 प्रतिशत होगा, तेलंगाना के 40% मंत्रियों में से एक तेलंगाना का मुस्लिम होगा। अगर मुख्यमंत्री एक क्षेत्र से हैं, तो दूसरे क्षेत्र को उप-मुख्यमंत्री का पद दिया जाना चाहिए।

इस सज्जनों के समझौते के बाद, केंद्र सरकार ने 1 नवंबर 1956 को आंध्र प्रदेश के एकीकृत राज्य की स्थापना की। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के नियमों के तहत, हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को आंध्र राज्य में मिला दिया गया और इसका नाम बदलकर ‘आंध्र प्रदेश’ कर दिया गया।

(6). राज्य पुनर्गठन अधिनियम :

राज्य पुनर्गठन अधिनियम 31 अगस्त 1956 को अधिनियमित / पारित किया गया था तथा 1 नवंबर 1956 को इसके प्रभावी होने से पहले, भारत के संविधान में किए गए एक महत्वपूर्ण संशोधन सातवें संशोधन के तहत, भाग A, भाग B, भाग C और भाग D राज्यों की मौजूदा शब्दावली को बदल दिया गया। भाग A और भाग B राज्यों के बीच का अंतर हटा दिया गया, और उन्हें केवल “राज्य” के रूप में संदर्भित किया गया। भाग C या भाग D राज्य के वर्गीकरण की जगह एक नए प्रकार की इकाई, केंद्र शासित प्रदेश का प्रावधान किया गया।
1 नवंबर को एक और अधिनियम भी लागू हुआ, जिसके तहत बिहार के कुछ क्षेत्रों को पश्चिम बंगाल में शामिल कर दिया गया। जिनमें मुख्य रूप से मानभूम और पूर्णिया जिलों के कुछ हिस्से शामिल थे।

(i).परिवर्तनों का प्रभाव :

•राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 भारत को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने की दिशा में एक बड़ा निर्णय था। नवंबर 1956 को पुनर्गठित भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश इस प्रकार है –

•आंध्र प्रदेश (1956-2014) : आंध्र प्रदेश (1956-2014): आंध्र राज्य और हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों के विलय से बना।

•असम: 1956 में सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

•बिहार: बिहार के कुछ क्षेत्रों को पश्चिम बंगाल में स्थानांतरित करने से बिहार का क्षेत्रफल 3166 वर्ग मील कम हो गया। मानभूम जिले के पुरुलिया उप-मंडल (पटमदा पुलिस स्टेशन को छोड़कर) तथा इस्लामपुर को पूर्णिया जिले से पृथक कर पश्चिम बंगाल में स्शामिल कर दिया गया।

•बॉम्बे राज्य: सौराष्ट्र राज्य और कच्छ राज्य, मध्य प्रांत के बरार डिवीजन और नागपुर डिवीजन के मराठी भाषी जिलों और हैदराबाद राज्य के बरार और औरंगाबाद डिवीजन को मिलाकर राज्य का विस्तार किया गया। बॉम्बे प्रेसीडेंसी के सबसे दक्षिणी जिलों को मैसूर राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया।

•जम्मू और कश्मीर: 1956 में सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

√केरल: त्रावणकोर-कोचीन राज्य को मालाबार जिले और मद्रास प्रेसीडेंसी के दक्षिण केनरा जिले को कासरगोड तालुका के साथ मिलाकर बनाया गया।

•लक्कादीव और मिनिकॉय द्वीपों को मालाबार जिले से अलग करके एक नया केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जिसका नाम लक्षद्वीप, अमिनदिवी और मिनिकॉय द्वीप है।

•मध्य प्रदेश: मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्य को मध्य प्रदेश में मिला दिया गया; नागपुर संभाग के मराठी भाषी जिलों को बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया।

•मद्रास राज्य: मालाबार जिले को केरल के नए राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया, दक्षिण कनारा जिले को विभाजित करके मैसूर राज्य और केरल में स्थानांतरित कर दिया गया। त्रावणकोर-कोचीन-कन्याकुमारी जिले का दक्षिणी भाग, सेंगोट्टई तालुक के साथ मद्रास राज्य में जोड़ा गया।

•मैसूर राज्य: कन्नड़ भाषी राज्य का निर्माण का अनुमोदन नहीं कर आयोग ने मैसूर राज्य का विस्तार कुर्ग राज्य, पश्चिमी मद्रास प्रेसीडेंसी के कन्नड़ भाषी क्षेत्रों, दक्षिणी बॉम्बे प्रेसीडेंसी और पश्चिमी हैदराबाद राज्य को जोड़कर किया गया। मैसूर राज्य के कुछ हिस्सों को इसमें शामिल न किए जाने पर कन्नड़ भाषियों को निराशा हुई क्योंकि बाहर रखे गए क्षेत्रों में सबसे उल्लेखनीय कासरगोड था, जो एकीकरण आंदोलन के केंद्रों में से एक था।

√उड़ीसा: 1956 में सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

•पंजाब: पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ को शामिल करके इसका विस्तार किया गया।

•राजस्थान: अजमेर राज्य और बॉम्बे तथा मध्य भारत के कुछ हिस्सों को मिलाकर इसका विस्तार किया गया।

•उत्तर प्रदेश: 1956 में सीमा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

•पश्चिम बंगाल: पूर्व में बिहार का क्षेत्र रहे, पुरुलिया जिले को शामिल करके इसकी सीमाओं का विस्तार किया गया, जो पहले बिहार का हिस्सा था।

(ii). केंद्र शासित प्रदेश (Union territories)

भाग सी और भाग डी क्षेत्र जो अन्य राज्यों में विलय नहीं किए गए थे, उन्हें केंद्र शासित प्रदेशों में परिवर्तित कर दिया गया:
•दिल्ली
•मणिपुर
•त्रिपुरा
•हिमाचल प्रदेश
•लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमिनदिवी द्वीप

परिणाम:
भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिली, क्योंकि लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति अधिक जुड़ाव की भावना आई। साथ ही भाषाई राज्यों के गठन से प्रशासन अधिक सुलभ और कुशल हो गया, क्योंकि लोग अपनी भाषा में सरकार से संपर्क कर सकते थे। इस पुनर्गठन से क्षेत्रीय आकांक्षाओं को तुष्ट किया गया जिससे इस मुद्दे पर विरोध का माहौल समाप्त हो गया।
अंततः
भाषाई आधार पर राज्यों के मांग संबंधी आंदोलन ने लोकप्रिय जन भावनाओं की असाधारण गहराई को भी प्रदर्शित किया। कन्नड़, आंध्र, उड़ीसा और महाराष्ट्रीयनों के लिए भाषा जाति और धर्म से भी बड़ी पहचान बन गई। इसका एक संकेत कलाओं के आधिकारिक संरक्षण में दिखाई दिया। राज्यों के आधिकारिक भाषाओं में लिखी गई पुस्तकों, नाटकों और फिल्मों को सरकार ने वित्तीय सहायता प्रदान किया और प्रोत्साहित किया।
इसकी दूसरी अभिव्यक्ति वास्तुकला में देखी गई नए राज्यों की राजधानी या नई विधानसभा का निर्माण उस समय प्रतिष्ठा की बात बन गई। उदाहरण के लिए उड़ीसा में निर्माण के लिए प्रस्तावित विविध सरकारी इमारतों की रूपरेखा और योजना बनाने के लिए वास्तुविदों को नियुक्त कर उन्हें उड़ीसा की सांस्कृतिक झलक दर्शाने वाली इमारत बनाने का निर्देश दिया गया।जब यह इमारते बनाकर तैयार हुई तो इसमें ढेर सारे स्वदेशी प्रतीकों, स्तंभों, मेहराबों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का इस्तेमाल किया गया था। भुवनेश्वर के इतिहासकार लिखते हैं कि “नए भुवनेश्वर का वास्तु ऐसी जमीन से निकला है जो बिल्कुल पवित्र और शुद्ध है।”
मैसूर प्रांत का नया विधानसभा सौंध सह-सचिवालय भी प्रांतीय गौरव का प्रदर्शन था जिसका निर्माण ब्रिटिशों द्वारा बनाई गई बैंगलोर उच्च न्यायालय की इमारत के सामने किया गया। मैसूर के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस हाई कोर्ट की इमारत को साम्राज्यवादी प्रतीक के रूप में देखा और उन्होंने इसे गिराने की इजाजत मांगी लेकिन इसकी इजाजत नहीं मिली तब उन्होंने इसके सामने ही विधानसभा की इमारत बनवाने का फैसला किया उन्होंने ऐसा ब्रिटिश इमारत को फीका और आकर्षक विहीन बनाने के उद्देश्य किया। विधानसभा की इस इमारत की गरिमा और आकर्षण भारतीय खासकर मैसूर अर्थात कर्नाटक के महान ऐतिहासिक साम्राज्यों की उत्कृष्ट वास्तु शैलियों का इकट्ठा सम्मिश्रण थी। यह इमारत कन्नड़ अस्मिता के शुद्ध मौलिक भावना के सफल प्रदर्शन का प्रतीक है।

जब भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग हुई तो यह माना गया इससे भारत का बाल्कीकरन हो जाएगा। दैनिक समाचार पत्र
टाइम्स आफ इंडिया ने फरवरी 1952 में लिखा कि भाषा के आधार पर देश के नक्शे को फिर से पुनर्गठित करने की कोई भी कोशिश लंबे समय से इंतजार कर रही प्रतिक्रियावादियों को फिर से मौका दे देगी कि वह खुलकर बाहर आए और अपनी मनमानी करें यह कदम भारत के एकीकरण के लिए बहुत बुरा साबित होगा। लेकिन जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो ऐसा लगता है की भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिली यह सही है कि भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से प्रांतीय गौरव की पुनर्स्थापना और प्रतिष्ठा हुई। इसने सकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया और यह संभव एवं सिद्ध हुआ कि हम एक ही साथ शांतिपूर्ण ढंग से कन्नड़, तमिल या उड़िया बने रहे तथा साथ ही एक संतुष्ट भारतीय भी।

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