Indian Marxists Historian : D.D.Kosambi

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प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकारों में ‘दामोदर धर्मानंद कोसांबी का एक विशिष्ट स्थान है। यद्यपि डॉ. कोसांबी मुख्यत: गणित एवं आनुवांशिकी के विद्वान थे तथापि वे इतिहास, पुरातत्व, नृतत्त्व-विज्ञान, मुद्रा-शास्त्र,अभिलेख, काव्य, साहित्य आदि ज्ञान के विभिन्न अनुशासनो एवं भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन से संबंधित प्रभूत वैचारिक तथ्य प्रदान किए हैं और ऐतिहासिक अनुसंधान को नया आयाम प्रदान किया है।

डॉ.कोसांबी का जन्म 1907 ई. गोवा में ज्ञान और सामाजिक व्यवहार के उच्च प्रतिमानो के लिए विख्यात परिवार में हुआ था। उनके पिता धर्मानंद कोसांबी सुप्रसिद्ध बौद्ध विद्वान थे, जिनसे उन्हें घुमक्कड़ मनोवृत्ति के साथ ही विलक्षण मेधा भी विरासत में प्राप्त हुई थी। दामोदर धर्मानंद कोसांबी ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गणित इतिहास और भाषाओं में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। भारत आने के बाद उन्होंने कुछ समय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गणित और जर्मन भाषा के प्राध्यापक के तौर पर अध्यापन किया तत्पश्चात ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ में गणित विषय के अध्यापन का कार्य किया। 1932 ईस्वी में उनकी नियुक्ति गणित के प्रोफेसर के पद पर ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ पुणे में हुई 1947 में वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई द्वारा गणित के अधिकारी के पद पर नियुक्त किए गए 29 जून 1966 को उनका देहावसान हो गया

डॉ. कोसांबी की रचनाएं :

डॉ. कोसांबी की 1956 में प्रकाशित पुस्तक, An Introduction to the Study of Indian History तथा The Culture and Civilization of Ancient India in Historical Outline भारतीय इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्या की जनक मानी गई है। Myth and Reality : Studies in the formation of Indian Culture, में उन्होंने भारतीय इतिहास से मिथक को पृथक करने का प्रयास किया है। डॉ. कोसांबी ने 1945 – 48 में भर्तृहरि के संस्कृत काव्य, शतकत्रयम और सुभाषित पर टीका लिखी। विद्याकर कृत सुभाषित रत्नकोश एवं दशबल की चिंतामणि सारणिका का संपादन किया। उनका नामक शोध पत्र अध्ययन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही आहत मुद्राओं का अध्ययन उनके वजन और धातुओं का मूल्य और मात्रा के आधार पर ऐतिहासिक संदर्भ में विश्लेषण कर, उन्होंने प्रागैतिहासिक इतिहास के अध्ययन में विशिष्ट योगदान दिया।

डॉ. कोसांबी की अध्ययन दृष्टि या दर्शन :

डॉ. कोसांबी ने अपनी वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति से इतिहास को नए संदर्भ और विज्ञान के भौतिक आधारों के माध्यम से समझने का प्रयास किया तथा भारतीय इतिहास के अध्ययन की परंपरागत दृष्टि का खंडन कर भौतिकवादी दृष्टि को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपनी रचनाओं में मार्क्स, एंगेल्स, स्टालिन को उद्धृत किया है। मार्क्सवादी विचारक राजनीतिक ही नहीं सभी प्रकार की घटनाओं को आर्थिक कारणों से उद्भूत और नियंत्रित मानते हैं। इनके अनुसार आर्थिक परिस्थितियों के ऊपर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थितियों की आवरण रूपी संरचना बनती है, जो आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ बदलती जाती हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास को इस दृष्टि से देखने का प्रयास डॉक्टर कोसांबी से प्रारंभ हुआ वस्तुतः भारतीय इतिहास की जटिल प्रक्रियाओं और परिप्रेक्ष्यों की मार्क्सवादी व्याख्या भारतीय इतिहास लेखन में उनका एक मौलिक एवं पृथक अवदान है।
डॉ. कोसांबी ने इतिहास को परिभाषित करते हुए लिखा है, “उत्पादन के संसाधनों एवं संबंधों में उत्तरोत्तर परिवर्तनों का तिथिक्रमानुसार प्रस्तुतिकरण हीं इतिहास है।” उनके अनुसार, “प्राचीन भारतीय ग्रंथों में अकस्मात दृष्टिगत होने वाले व्यक्तित्व एवं घटनामूलक विवरणों को एक रूमानी कल्पित कथानक या भारतीय रेल की समय सारिणी के रूप में देखना चाहिए।” इतिहास की व्याख्या के महत्व पर उनका मत है, “अधिक महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कौन राजा था अथवा किसी क्षेत्र में कोई शासक था या नहीं, अपितु महत्वपूर्ण यह है कि किसी क्षेत्र में रहने वाली जनता के द्वारा भारी या हल्के हल का प्रयोग उस समय किया जाता था नहीं या नहीं। शासन परिवर्तनों का अध्ययन इस दृष्टि अधिक महत्वपूर्ण है कि उत्पादन के आधारों में शक्तिशाली परिवर्तनों को कितनी गति प्रदान कर सके।” कोसांबी का कथन है, “वह कृष्ण को जानने के इतने इच्छुक नहीं है जितने यह जानने के इच्छुक हैं कि कृष्ण किस तरह के मृदभांडों का उपयोग करते थे – चित्रित धूसर मृदभांडो या काले पॉलिशदार मृदभांडों का।” अर्थात कोसांबी कृष्ण कालीन भौतिक परिवेश की जानकारी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे।
अपने मार्क्सवादी सिद्धांतों के तहत डॉ. कोसांबी ने भारतीय इतिहास का काल निर्धारण, उत्पादन, उत्पादन के संसाधनों और संबंधों के दृष्टिकोण से कृषि, व्यापार, दास, सामंतवाद, व्यक्तिगत संपत्ति और पूंजीवाद के विकास के आधार पर किया है।
डॉ. कोसांबी द्वारा निर्धारित भारतीय ऐतिहासिक कालखंड –

1. नगरीय स्थिर सिंधु-घाटी संस्कृति (3000 -1500) BC.

2. आर्यीकरण अर्थात उत्तर कालीन कांस्य तथा प्रारंभिक लौह युग, कृषि, पशुचारण संगठन की द्विजातीय पद्धति का चार जातियों में विकास (800) BC

3. गंगा घाटी के घने जंगलों को शूद्र श्रम के माध्यम से साफ कर आवास स्थापित करना, मगध साम्राज्य के उद्भव तक (500 – 250) BC.

4. आदिम प्रकार का सामंतवाद – जिसमें संपूर्ण मध्य देश में कृषि तथा व्यापार का और इसके साथ ही व्यक्तिगत संपत्ति का विकास (400 AD) के पूर्व

5. उत्तर वादी गुप्त युग में विशुद्ध सामंतवाद का प्रारंभ और मुस्लिम व्यापार तथा सेना का प्रवेश (1200 AD) के बाद

6. आधुनिक पूंजीवाद तथा नए स्वदेशी बुर्जुआ शासन का प्रारंभ।

इस कालक्रम विभाजन में डॉ. कोसांबी ने संस्कृति के विकास के अनेक आधारों और प्रेरणाओं को नजरअंदाज किया है। भारतीय इतिहास की पुनर्रचना से संबंधित कठिनाइयों के संदर्भ में कोसांबी की मान्यता है कि, “भारतीय इतिहास से संबद्ध लिखित स्रोत धार्मिक विवरणों एवं प्रशस्तियों पर आधारित है तथा यहां पुरातत्व के विकास का अभाव है।” अत्यव डॉ. कोसांबी ने अपनी ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति में सूक्ष्म पाषाण (Microlith), महापाषाण (Megalith), पुरातात्विक अवशेष, नृतत्व विज्ञान (Anthropology) के साथ ही मुद्राओं को भी वस्तुगत साक्ष्यों के रूप में समन्वित किया।

उन्होंने भारत की प्राचीनतम मुद्रा, ‘आहत मुद्राओं’ के अध्ययन के लिए “अंतरानुशासनिक (Interdisciplinary अर्थात दो या अधिक विषयों का एक साथ अध्ययन) दृष्टिकोण” का और गणित की सांख्यिकी पद्धति का प्रयोग कर ऐतिहासिक अध्ययन को नितांत मौलिक दिशा दी, जैसे – मौर्यकालीन आहत मुद्राओं में रजत की जगह कम मूल्य की धातुओं की मिलावट में वृद्धि के आधार पर डॉ. कोसांबी की मान्यता है, “निरंतर रिक्त होते मौर्य राजकोष ने मौर्य साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।”

ऐतिहासिक निष्कर्ष :

डॉ. कोसांबी के अनुसार प्रागैतिहासिक कालीन सभ्यताओं में नगरों का विकास मुख्यतः नदी तटों पर इसलिए हुआ क्योंकि नदियों से भोजन हेतु मछली और पीने का पानी तथा सिंचाई और आवागमन की सुविधा नि:शुल्क प्राप्त थी। उनकी मान्यता है कि आर्य बाह्य आगंतुक एवं सिंधु सभ्यता के विनाशक थे तथा उनकी अर्थव्यवस्था का स्वरूप ग्रामीण था। लोहा और हल के अविष्कार द्वारा उन्होंने अनार्यों पर तथा धर्म यज्ञों के साथ ही उत्पादन शक्ति पर प्रभाव कायम कर लिया। धर्म-कर्म और कृषि-कर्म के कर्ता के रूप में क्रमशः ब्राह्मण और शूद्र-वर्ग पद्धति विकसित हुई। यूरोप के विपरीत भारत में शूद्र व्यक्तिगत ना होकर संपूर्ण समाज के सेवक थे तथा इस प्रकार भारत में दास-प्रथा के विकास का निषेध शूद्र जाति के निर्माण की प्रक्रिया ने किया। कार्य निर्धारण से व्यक्तिगत कार्यकुशलता एवं क्षमता में परिवर्तन एवं विस्तार हुआ, पशुपालक समाज कृषि-उद्योग-व्यापार की स्थिति में पहुंच गया। धातु के प्रयोग के साथ जनजातीय समाज धर्म एवं सिद्धांतों के विकास से सभ्यता की ओर उन्मुख हुआ ऐसे समय में धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ और विस्तृत राज्य की लालसा से महाजनपदों का निर्माण हुआ, जिनमें मगध धातु भंडारों और भौगोलिक श्रेष्ठता से युक्त होने के कारण सर्वाधिक शक्तिशाली बन गया। उनके अनुसार मोदी युग में ग्राम में अर्थव्यवस्था का अभूतपूर्व विस्तार हुआ तथा उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य का प्रभुत्व बड़ी संख्या में प्रशासन अधिकारियों की नियुक्ति नकद वेतन भुगतान तथा विशाल सेना का अस्तित्व समृद्ध मोरे राजपूत के परिचायक हैं इससे कर व्यवस्था कठोर और उत्पीड़ित हो गई लेकिन अशोक की उदारता के कारण राज्य आर्थिक संकट में आ गया जिससे सुदूर दक्षिण में मौर्य साम्राज्य का प्रसार बाधित हुआ।
डॉ. कोसांबी ने अपने ऐतिहासिक निष्कर्षों में गुप्त स्वर्ण-युग की अवधारणा को गुप्त युग में व्याप्त जातीय संकीर्णता, नगरों की अवनति, ब्राह्मण और क्षत्रिय तक संस्कृत के सीमित रहने आदि तथ्यों के आधार पर खारिज करते हुए लिखा है, “गुप्त सम्राटों ने प्राचीन काल में राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित नहीं किया था, आधुनिक राष्ट्रवाद ने गुप्तों को पुनर्जीवित किया।”

वस्तुत: कोसांबी का इतिहास दर्शन उत्पादन प्रक्रिया के प्राविधिक परिवर्तनों पर आधारित है। भक्ति और अन्य धार्मिक समुदायों की सामाजिक पृष्ठभूमि की उनकी समाजशास्त्रीय वैज्ञानिक व्यवस्था भौतिक धरातल पर नवीन दृष्टिकोण अवश्य प्रस्तुत करती है परंतु सभी संदर्भो में जैसे, अपने गीता दर्शन में कोसांबी कर्मवाद और अवतारवाद की ऐतिहासिक व्याख्या उतारने में को भौतिक आयाम देने या आर्थिक धरातल पर उतारने में असफल रहे क्योंकि गीता को सामंतवाद की मैनुअल बताना तथा “उपास्य देव और उपासक भक्त” के संबंध को जेडभूस्वामी और कृषक दासजेड के संबंधों के अनुरूप मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।

डॉक्टर दामोदर धर्मानंद कोसांबी ने अपनी वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति द्वारा इतिहास को नए संदर्भों और विज्ञान के भौतिक आधारों के माध्यम से विवेचित विश्लेषित करने का कार्य किया। उनकी ऐतिहासिक शोध या लेखन पद्धति को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। डॉ. कोसांबी को “Father of Scientific Indian History” कहा गया है।
उनके अनुसार, “इतिहासकार का कार्य अतीत से प्रेम करना या उससे छुटकारा पाना नहीं बल्कि वर्तमान को स्पष्ट करने वाली कुंजी के रूप में अतीत की गहराई में जाकर उसे खोलकर समझना है। इतिहासकार का अतीत संबंधित चित्र वर्तमान की समस्याओं को समझने वाली अंतर्दृष्टि से आलोकित होने पर महान इतिहास रचा जाता है। इतिहास से सीखना एक तरफा प्रक्रिया नहीं है, अतीत के प्रकाश में वर्तमान को समझने का अर्थ वर्तमान के प्रकाश में अतीत को समझना भी है।” इतिहास का प्रयोजन है – “अतीत और वर्तमान के बीच अंत: संबंध के द्वारा इन दोनों के विषय में अधिक अधिक जानकारी प्राप्त करते रहना।” इतिहास लेखन में डॉ. दामोदर धर्मानंद कोसांबी के योगदान को मौलिक एवं वैज्ञानिक कहा जा सकता है, उन्होंने इतिहास की पुनर्रचना को वस्तुनिष्ठता प्रदान की है।

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