# Comprehensive History > A Critical, Objective and Analytical Assessment of Historical Events ## Posts - [पैगंबर मुहम्मद : इस्लाम का उद्भव](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a6-%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%be/): मुहम्मद (सी. 570 – 8 जून 632 ई.), अरब के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेता और इस्लाम के संस्थापक थे। इस्लामी सिद्धांत के अनुसार, वह एक पैगंबर थे जिन्हें एकेश्वरवादी शिक्षाओं का प्रचार करने के लिए ईश्वरीय प्रेरणा मिली थी। उन्हें इस्लामी सिद्धांतों के अंतर्गत पैगम्बरों की मुहर (पैगम्बरों की मुहर कुरान में प्रयुक्त एक उपाधि है, तथा मुसलमानों द्वारा इस्लामी पैगम्बर मुहम्मद को ईश्वर द्वारा भेजे गए अंतिम पैगम्बर के रूप में नामित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।) माना जाता है। सुन्नत, इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं और प्रथाओं का समूह है जो मुसलमानों के […] - [जीवक : भारतीय चिकित्सा विज्ञानी](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c/): “जीवक (पाली: जीवक कोमारभक्का;’ संस्कृत: ‘जीवक कौमारभृत्य’, बुद्ध और भारतीय राजा बिम्बिसार के निजी चिकित्सक थे। जीवक, 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में राजगृह, वर्तमान राजगीर में रहते थे। उन्हें “चिकित्सा का राजा” और “तीन बार ताज पहनाया गया चिकित्सक” के रूप में वर्णित किया जाता है। एशिया की पौराणिक कथाओं में एक आदर्श चिकित्सक के रूप में जीवक का नाम आता है। जीवक के विषय में विवरण प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों की कई पाठ्य परंपराओं जैसे ‘पाली’ और :मूलसर्वास्तिवाद’ परंपराओं, बुद्ध के प्रवचनों और भक्ति अवदान ग्रंथों में पाए जाते हैं। इनके अनुसार जीवक का जन्म एक वेश्या (गणिका) के घर […] - [Ethno-nationalist Conflict : Pakistan](https://comprehensivehistory.com/ethno-nationalist-conflict-pakistan/): अहमदिया, आधिकारिक तौर पर अहमदिया मुस्लिम जमात (AMJ) एक आधुनिक इस्लामी संप्रदाय है जो दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी समुदाय है।। इसकी स्थापना मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (1835-1908) ने की थी, जिन्होंने कहा था कि उन्हें ईश्वर ने कयामत के दिन आनेवाले महदी (मार्गदर्शित व्यक्ति) और मसीहा दोनों के रूप में नियुक्त किया है। इस अंतिम समय में शांतिपूर्ण तरीकों से इस्लाम की अंतिम विजय होगी। मिर्जा गुलाम अहमद के अनुयायी, (मुहम्मद के वैकल्पिक नाम अहमद के संदर्भ में), अहमदी मुसलमान या केवल अहमदी के रूप में जाने जाते हैं। अहमदी विचारधारा इस विश्वास पर केंद्रित है कि पैगंबर मुहम्मद को […] - [Farazi Movement](https://comprehensivehistory.com/farazi-movement/): फ़राज़ी आंदोलन या अभियान,1819 में पूर्वी बंगाल में हाजी अली हमज़ा अवान के नेतृत्व में आरम्भ एक धार्मिक पुनरुत्थान अभियान था जिसका उद्देश्य गैर-इस्लामी गतिविधियों को त्यागना और मुसलमानों के रूप में अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करना था। फ़राज़ी आंदोलन की शुरुआत हाजी शरीयतुल्लाह ने की थी। फ़राज़ी आंदोलन 19 वीं शताब्दी का इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन था। फराइज़ी प्रथाओं में कुछ अंतर के साथ ‘हनफ़ी’ विचार का पालन करते थे। फराइज़ी आंदोलन, का मूल उद्देश्य गैर-इस्लामिक प्रथाओं को त्यागना था। यह पूर्वी बंगाल में गैर-इस्लामी प्रथाओं को छोड़ने और मुसलमानों को अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित […] - [Science and Technology in Ancient India : Agriculture](https://comprehensivehistory.com/science-and-technology-in-ancient-india-agriculture/): मौर्यकालीन भारत के आर्थिक क्रियाकलापों में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान था। यूनानी लेखकों के अनुसार मौर्य काल में भारत की अधिकांश जनता कृषक थी। कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र से मौर्य कालीन भारत में कृषि से संबद्ध विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। मौर्य अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान – मौर्यकालीन कृषि की प्रकृति राज्य नियंत्रित और राजकीय कृषि के सदृश थी। वस्तुत: अति विस्तृत मौर्य साम्राज्य की सुरक्षा हेतु विशाल सेना अत्यावश्यक थी। आपात स्थितियों के लिए राजकोष में पर्याप्त अधिशेष बनाए रखने की नीति भी भयंकर आर्थिक दवाब की जनक थी। राजकीय व्ययों के लिए सामान्य कर अपर्याप्त थे इसलिए […] - [History as Narrative](https://comprehensivehistory.com/history-as-narrative/): इतिहास समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन है, और इसमें मानव समाज के सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, चिकित्सा, सांस्कृतिक, बौद्धिक, धार्मिक और सैन्य विकास आदि सभी इतिहास का अंग हैं। कथा एक ऐसी कहानी है जिसे लिखा या किसी को बताया (आमतौर पर बहुत विस्तार से) जाता हैं। कथा का स्वरूप, पद्य-गद्य, लोकगीत, रंगमंच या नृत्य में हो सकता है। कथात्मक इतिहास, कहानी-आधारित रूप में इतिहास लिखने की प्रथा है। इसमें अल्पकालिक घटनाओं की श्रृंखला के पुनर्निर्माण के आधार पर इतिहास-लेखन शामिल होता है। ‘अरस्तू’ को आधुनिक कथा-विज्ञान का संस्थापक […] - [Oral History](https://comprehensivehistory.com/oral-history/): मौखिक इतिहास व्यक्तियों, परिवारों, महत्वपूर्ण घटनाओं या रोजमर्रा की जिंदगी से संबद्ध ऐतिहासिक जानकारी का संग्रह और अध्ययन है। मौखिक इतिहास उन लोगों से ऐतिहासिक जानकारी एकत्र करने की एक विधि है, जिन्हें विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान है। इसमें शामिल हो सकते हैं – प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य, लोककथाएँ, मिथक, गीत, सालों से मौखिक रूप से प्रसारित कहानियाँ, सामुदायिक कहानियाँ, यादें (जो व्यक्तिगत अनुभवों या अलौकिक अनुभव का विवरण है), दृश्य ओर श्रवण माध्यम में तथ्यों का संग्रहण और नियोजित साक्षात्कारों की प्रतिलिपि के द्वारा उन ऐतिहासिक घटनाओं में भाग लेने, अवलोकन करने वाले तथा विभिन्न ऐतिहासिक त्रासदियों के भुक्तभोगी जन, की […] - [Use and Misuse of History](https://comprehensivehistory.com/use-and-misuse-of-history/): किसी भी विषय का उपयोग तथा दुरुपयोग उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। इतिहास भी मानव समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है परंतु महत्वाकांक्षी व्यक्तियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए इसका दुरुपयोग किए जाने से यह विषय भी कुछ अंशो में अनुपयोगी सिद्ध हो गया है। इतिहास की उपयोगिता अथवा अन उपयोगिता की विवेचना के लिए दोनों पक्षों का अलग-अलग विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है। इतिहास का उपयोग : आधुनिक युग में इतिहास की उपादेयता समाज के समक्ष एक महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न है तकनीकी विज्ञान तथा चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने वाले विद्यार्थी निश्चित रूप से अभियंता या चिकित्सक बनते हैं […] - [Early Historians of India : Kalhana](https://comprehensivehistory.com/early-historians-of-india-kalhana/): भारत के प्राचीन इतिहास लेखन में कल्हण को अति महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है कल्हण ने कश्मीर के इतिहास से संबद्ध प्रसिद्ध पुस्तक राजतरंगिणी की रचना की थी। कल्हण का जन्म संभवत: 12 वीं शताब्दी के प्रारंभिक कालखंड में, कश्मीर में स्थित एक स्थान, परिहासपोर में एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसके पिता चनपक (Chanpaka) लोहार वंश के शासक हर्ष के मंत्री थे। राजतरंगिणी (The River of Kings)भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग, विशेष रूप से कश्मीर के राजाओं का एक छंदात्मक, पौराणिक और ऐतिहासिक वृत्तांत है। इसे कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ने 12वीं शताब्दी ई. में संस्कृत में लिखा था। […] - [Indian Marxists Historian : D.D.Kosambi](https://comprehensivehistory.com/indian-marxists-historian-d-d-kosambi/): प्राचीन भारत के आधुनिक इतिहासकारों में ‘दामोदर धर्मानंद कोसांबी का एक विशिष्ट स्थान है। यद्यपि डॉ. कोसांबी मुख्यत: गणित एवं आनुवांशिकी के विद्वान थे तथापि वे इतिहास, पुरातत्व, नृतत्त्व-विज्ञान, मुद्रा-शास्त्र,अभिलेख, काव्य, साहित्य आदि ज्ञान के विभिन्न अनुशासनो एवं भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन से संबंधित प्रभूत वैचारिक तथ्य प्रदान किए हैं और ऐतिहासिक अनुसंधान को नया आयाम प्रदान किया है। डॉ.कोसांबी का जन्म 1907 ई. गोवा में ज्ञान और सामाजिक व्यवहार के उच्च प्रतिमानो के लिए विख्यात परिवार में हुआ था। उनके पिता धर्मानंद कोसांबी सुप्रसिद्ध बौद्ध विद्वान थे, […] - [Indian Liberal Historian : Kali Kinkar Dutt](https://comprehensivehistory.com/indian-liberal-historian-kali-kinkar-dutt/): आधुनिक भारत के इतिहास लेखन से संबंधित इतिहासकारों में ‘डॉ. काली किंकर दत्त’ का महत्वपूर्ण स्थान है। डॉ.दत्त ने मुख्यतः आधुनिक बिहार और बंगाल के इतिहास के प्राय: सभी पहलुओं पर गहन शोध किया। वे, बिहार एवं उड़ीसा प्रांत द्वारा जारी शोध छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले प्रथम शोधार्थी थे। डॉ. दत्त का जन्म 5 मई 1905 को वर्तमान ‘झारखंड’ राज्य स्थित ‘पाकुर’ जिला के ‘झिकरहाटी’ नामक गांव में हुआ था। इनके पिता ‘सदानंद दत्त’ उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे। डॉ.काली किंकर दत्त ने 1927 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातकोत्तर किया। 1928 में उन्होंने ‘डॉ. सुविमल चंद्र सरकार’ […] - [मेसोपोटामिया की सभ्यता : स्रोत](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8/): ‘ताम्र-कांस्ययुगीन’ उत्कृष्ट सभ्यताओं का उदय नदी घाटियों में हुआ था। पश्चिमी एशिया में दजला-फरात नदी की घाटी में जिस सभ्यता का उदय और उत्कर्ष हुआ, उसे ‘मेसोपोटामिया’ की सभ्यता कहते हैं। मेसोपोटामिया दो शब्दोें मेसो+ पोटाम से बना है, जिसमें ‘मेसो’ का अर्थ ‘मध्य’ और ‘पोटाम’ का अर्थ नदी होता है। अतएव ‘मेसोपोटामिया’ का शाब्दिक अर्थ है – “नदियों के बीच का प्रदेश।” पश्चिमी एशिया को स्थूल रूप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –  A.उत्तर का पर्वतीय प्रदेश,  B.मध्य में अर्धचंद्राकार मैदान की पट्टी, तथा  C.दक्षिण में अरब का विशाल रेगिस्तानी प्रायद्वीप।  मध्य की अर्धचंद्राकार पट्टी […] - [Decline of Assyrian Empire](https://comprehensivehistory.com/decline-of-assyrian-empire/): असीरिया की सभ्यता ताम्र – कांस्य युगीन  मेसोपोटामिया में विकसित प्रमुख सभ्यता थी।21वीं शताब्दी ई. पू – 14 वीं शताब्दी ई.पू. तक एक नगर राज्य के रूप में अस्तित्व में रहा असीरियाई राज्य, इसके बाद क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति मे और 14 वीं – 7 वीं शताब्दी ई. पू. तक एक साम्राज्य में परिणत हो गया , जिसे इतिहासकार  ताम्र – कांस्य युगीन विश्व का प्रथम साम्राज्य मानते है। असीरिया की सभ्यता का इतिहास प्रारंभिक कांस्य युग से लौह युग के अंतिम चरण तक विस्तृत है। आधुनिक इतिहासकारों ने असीरियाई सभ्यता के इतिहास को चार कालखंडों में विभक्त किया है –  […] - [सोवियत संघ के विघटन से उत्पन्न परिस्थितियां](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/): सोवियत संघ के विघटन से उत्पन्न परिस्थितियां सोवियत संघ की सेना प्रारंभ में ‘CIS’, के नियंत्रण में रहीं परंतु शीघ्र ही स्वतंत्र नवोदित राष्ट्रों की पृथक-पृथक सेना के रूप में विभक्त हो गई । कुछ अन्य सोवियत संस्थाएं “जिसका अधिग्रहण रूस द्वारा नहीं किया गया” 1991 के अंत के साथ उनका कार्य समाप्त हो गया । विघटन के बाद अंतरराष्ट्रीय संधियों और राजनीति में रूस (Russian Federation) को सोवियत संघ का वैधानिक उत्तराधिकारी होने की पहचान प्राप्त हुई। रूस, ने स्वेच्छा से भूतपूर्व सोवियत संघ की, अन्य राष्ट्रों के प्रति देनदारियों को स्वीकार किया और विदेशों में सोवियत संघ की […] - [सोवियत संघ के विघटन की समय रेखा](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be/): सोवियत संघ के विघटन की समय रेखा ‘मिखाईल गोर्बाचोव’, के तख्तापलट का प्रयास सोवियत संघ के विघटन में अंतिम आघात सिद्ध हुआ। गोर्बाचोव ने पार्टी के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया तथा येल्तसिन ने  6 नवंबर 1991 को एक शासनादेश के द्वारा रूस की धरती पर कम्युनिस्ट पार्टी की सभी गतिविधियों को प्रतिबंधित कर दिया।  यद्यपि सोवियत संघ के 12 गणराज्य एक सीमित संघ के लिए वार्ता कर रहे थे तथापि बोरिस येल्तसिन गणराज्यों की स्वतंत्रता का पक्षधर था। 1 दिसंबर1991 को संघ के द्वितीय प्रमुख गणराज्य, यूक्रेन ने भी जनमत संग्रह द्वारा अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। […] - [सोवियत संघ के विघटन के कारक](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%95/): सोवियत संघ के विघटन का आरंभ करने वाले कारक 1. संप्रभुता की परेड (The parade of sovereignties) सोवियत संघ के गणराज्यों के द्वारा, 1988 – 1991 के मध्य, अपनी संप्रभुता घोषित किए जाने का एक क्रम था। ये संप्रभुता वैधानिक शर्तों पर आधारित थी, जिसमें गणराज्य की आंतरिक संप्रभुता को सोवियत संघ के केंद्रीकृत वैधानिक शक्ति से सर्वोच्च घोषित किया गया था। इन घटनाओं से सोवियत संघ और उसके गणराज्यों के मध्य वैधानिक संघर्ष ‘War of Laws’ की शुरुआत हो गई,संघ को कायम रखने के लिए जनवरी 1987 में मिखाईल गोर्बाचोव ने, ‘Demokratizatsiya’ की नीति अपनाने का नारा दिया। ‘ […] - [साम्यवाद की विफलता](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/): सोवियत संघ के ‘East Block’ में साम्यवाद की विफलता मिखाईल गोर्बाचोव, सोवियत संघ के ‘Satellite States’ अर्थात औपचारिक रूप से स्वतंत्र परंतु राजनीतिक,आर्थिक दृष्टि से, सोवियत संघ के प्रभाव और नियंत्रण वाले देशों में साम्यवादी शासन के प्रति हो रही विद्रोही गतिविधियों के प्रति तटस्थ रहा। इससे पहले लियोनिड ब्रेझनेव की विदेश नीति में, Soviet Satellite States (समाजवादी शासन वाले, सोवियत या ईस्ट ब्लॉक कहे जाने वाले, केंद्रीय और पूर्वी यूरोप में स्थित देश) की आंतरिक संप्रभुता पर कठोर नियंत्रण रखा जाता था तथा इनमें से किसी देश पर खतरा सभी पर संकट माना जाता था। गोर्बाचोव ने नई राजनीतिक […] - [सोवियत संघ का विघटन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8/): सोवियत संघ में विघटनकारी प्रवृत्तियों का प्रादुर्भाव 1977 अक्टूबर में तीसरे ‘सोवियत संविधान’ को सर्वसम्मति से लागू किया गया लेकिन 1980 के दशक के आरंभ तक ‘सोवियत कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी’, जराजन्य प्रवृत्तियों के प्रभाव में आ चुकी थी। ‘लियोनिड ब्रेझनेव’ लंबे कार्यकाल के बाद जीवन के आखिरी वर्षों में अपने पूर्व जुझारू व्यक्तित्व की धुंधली छवि मात्र रह गया था। यह कालखंड सोवियत संघ के इतिहास में “स्थिरता का युग(Era of Stagnation)” था। जब आर्थिक,राजनीतिक क्षेत्र में संकट व्याप्त था, जबकि सोवियत संघ के नेतृत्व कर्ता स्थिति में सुधार लाने की जगह किंकर्तव्यविमूढ़ थे। ब्रेझनेव द्वारा अफगानिस्तान पर पुनः आक्रमण […] - [सोवियत संघ क्या है?](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/): सोवियत संघ का परिचय सोवियत संघ (USSR) का औपचारिक नाम “सोवियत समाजवादी गणतंत्रो का संघ” या “Union of Soviet Socialist Republic” था। ‘सोवियत’ रूसी भाषा का एक शब्द है, जिसका अभिप्राय परिषद, सभा, सलाह और सद्भाव होता है। सोवियत संघ उत्तरी यूरेशिया के विशाल भू-भाग पर विस्तृत, एक अंतरमहाद्वीपीय देश था। यह 22,402,200 वर्ग किलोमीटर  (8,649,500 वर्ग मील) भू-भाग और 11 समय क्षेत्रों [एक भौगोलिक क्षेत्र जिसके भीतर समान मानक समय (Time Zone) का उपयोग किया जाता है।],में विस्तृत विश्व का सबसे बड़ा देश था, जो 1922 से 1991 तक अस्तित्व में रहा। अपनी स्थापना से 1990 तक साम्यवादी दल […] - [वियना कांग्रेस का मूल्यांकन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/): वियना कांग्रेस के प्रावधान यूरोपीय राष्ट्रों के राजनीतिक संबंधों में युगांतकारी परिवर्तन के प्रेरक थे। वियना के राजनयिकों ने अतीत को पुनर्जीवित करने के प्रयास को निरर्थक मानकर पवित्र रोमन साम्राज्य की पुनर्स्थापना की कोशिश नहीं की तथा 300 पोप शासित राज्यों का 39 राज्यों में पुनर्गठन ने जर्मनी के भावी एकीकरण  का मार्ग प्रशस्त कर दिया। केंद्रीय यूरोप में ऑस्ट्रिया का संकेंद्रण, भविष्य में जर्मन राजनीति में से उसके राजनीतिक अलगाव का प्रथम चरण था। सार्डिनिया को सशक्त बनाने से वहां शक्तिशाली नेतृत्व क्षमता का प्रादुर्भाव हुआ। ये दोनों तथ्य यूरोप की राजनीति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटना और […] - [नेपोलियन बोनापार्ट की पुनर्वापसी और अंतिम निर्वासन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8/): वियना में आयोजित सम्मेलन के दौरान घटित एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में फरवरी 1815 में नेपोलियन बोनापार्ट के, ‘एल्बा द्वीप’ की कैद से भाग कर फ्रांस वापसी और फ्रांसीसी जनता के समर्थन से पुन: फ्रांस की सत्ता प्राप्त करने की घटना से पुन: युद्ध का आरंभ हो गया। वियना कांग्रेस में शामिल राष्ट्रों ने 9 जून 1815 को संधि के मसौदे पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर कर दिया। वियना कांग्रेस के अंतिम प्रारूप पर हस्ताक्षर के 9 दिनों के बाद 18 जून 1815 को नेपोलियन बोनापार्ट को अंतिम रूप से परास्त कर सेंट हेलेना द्वीप में निर्वासित कर दिया गया तथा […] - [वियना कांग्रेस अनुबंध का प्रारूप](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7/): वियना कांग्रेस में शामिल राष्ट्रों ने 9 जून 1815 को संधि के मसौदे पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर कर दिया। वियना कांग्रेस में हुए अनुबंधों के अंतिम प्रारूप में पेरिस की प्रथम शांति संधि के अतिरिक्त पृथक रूप से हुई अन्य सभी द्विपक्षीय संधियों को संगठित किया गया। वियना में हुए अनुबंधों का अंतिम प्रारूप की 121 धाराओं द्वारा निम्नलिखित निर्णय लिए गए: रूस को डची ऑफ वारसा के साथ 1809 में स्वीडन से अधिकृत फिनलैंड पर आधिपत्य कायम रखने का अधिकार मिला।  प्रशा को वारसा की ग्रैंड डची का पोसेन क्षेत्र, डेंजिंग और राइनलैंड/वेस्टफेलिया प्राप्त हुआ। ब्रिटेन का नियंत्रण […] - [वियना कांग्रेस के लक्ष्य](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af/): वियना कांग्रेस के सदस्य राष्ट्रों में पारस्परिक मतभेदों के बावजूद सभी फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन के विरोधी थे तथा 1789 से 1815 तक की घटनाओं की पुनरावृति रोकने के लिए प्रयासरत थे नेपोलियन के सैन्य अभियानों से यूरोप का विशेषकर मध्य यूरोप का राजनीतिक ढांचा और शक्ति संतुलन बदल गया था। अतः मध्य यूरोप की अंतरराष्ट्रीय सीमा एवं राजनीतिक स्वरूप तथा नेपोलियन के विरुद्ध युद्धों में विभिन्न देशों की भूमिका का निर्धारण करने के लिए कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। जिसमें फ्रांसीसी विदेश मंत्री तालिरां ने अपनी कूटनीतिक प्रतिभा से फ्रांस के हितों की रक्षा की। तालिरां ने वैधता […] - [वियना कांग्रेस के निर्णयकर्ता](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d/): वस्तुतः वियना कॉन्ग्रेस वास्तविक अर्थों में एक औपचारिक कांग्रेस नहीं थी क्योंकि ना कभी इसका उद्घाटन हुआ और ना ही एक सभा के तौर पर समस्याओं पर विचार के लिए इसकी बैठके  हुई बल्कि निर्णय विजेता राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने ही मुख्य रूप से लिए। वियना में यूरोप के सभी राज्यों के प्रतिनिधि मंडल थे जिसमें चीन में जिनमें 200 से अधिक राष्ट्र और रियासतों के  प्रतिनिधियों के अतिरिक्त नगरों, निगमों धार्मिक संगठनों तथा विशेष हित समूह यथा  जर्मन प्रकाशक, जो कॉपीराइट कानून और स्वतंत्र प्रेस की मांग के लिए कांग्रेस में शामिल हुए थे। वियना में उपस्थित इन सभी […] - [वियना कांग्रेस की पृष्ठभूमि](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf/): यूरोपीय इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘वियना कांग्रेस’ का आयोजन ‘सितंबर 1814 – जून 1815’ के मध्य, नेपोलियन के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली, यूरोपीय शक्तियों के द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य था – नेपोलियन के युद्धों से परिवर्तित, यूरोपीय मानचित्र की पुनर्व्यवस्था और इस व्यवस्था की भविष्य में सुरक्षा के लिए संयुक्त प्रयास द्वारा दिशानिर्देश तय करना। वियना कांग्रेस की पृष्ठभूमि में फ्रांसिसी क्रांति और नेपोलियन बोनापार्ट के सैन्य अभियानो का यूरोपीय राजनीति पर युगांतकारी प्रभाव से उत्पन्न अंतर्द्वंद था। जिसमें एक और फ्रांस की क्रांति से प्रेरित परिवर्तनवादी तत्व थे, जिन्हें जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिक विकास, […] - [हम्मूराबी की 'विधि-संहिता'](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be/): संभवत: ‘हम्मूराबी’ की ‘विधि-संहिता’ इतिहास की प्राचीनतम ‘विधि-संहिता’ है, जो अखंड रूप में मिली है। ‘हम्मूराबी’ ने अपनी संहिता को स्थाई रूप देने के लिए, उसे लगभग 8 फीट ऊंचे पाषाण स्तंभ पर 360 पंक्तियों में उत्कीर्ण करवा कर ‘बेबीलोन’ में ‘मर्दुक’ के ‘मंदिर-ए-सागिल’ में स्थापित किया था। यद्यपि संहिता का निर्माण आवश्यकता के आधार पर व्यावहारिक दृष्टिकोण से किया गया था लेकिन जनता के मध्य इसे श्रद्धेय बनाने के लिए ‘संहिता-लाट’ को धार्मिक रूप दिया गया था। ‘संहिता-लाट’ के ऊपरी भाग में न्याय के संरक्षक देवता ‘शमश (सूर्य देव)’ को सिंहासन पर संहिता हाथ में लेकर विराजमान दर्शाया गया […] - ['हम्मूराबी' का न्याय-प्रशासन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8/): ‘हम्मूराबी’ एक श्रेष्ठ  प्रशासक था। उसने ‘मेसोपोटामिया’ की सभ्यता में प्रचलित स्वतंत्र ‘नगर-राज्यों’ की परंपरा को समाप्त कर, सम्राट और केंद्रीय सत्ता के अधीन केंद्रीकृत बेबीलोनियन साम्राज्य की स्थापना की। बेबिलोनिया को सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य उसने नागरिकों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा की व्यवस्था की। ‘मारी’ नगर के उत्खनन से प्रचुर संख्या में प्राप्त मिट्टी की पाटियों पर उत्कीर्ण प्रशासनिक विषयों से संबद्ध हम्मूराबी की आज्ञाएं और निर्णय उसकी प्रशासनिक प्रतिभा और बेबीलोन की प्रशासनिक गतिविधियों की जानकारी के स्रोत हैं। ये पत्र विविध विषयों से संबंधित है, जैसे – पंचांग में अतिरिक्त माह जोड़ना, एक […] - ['हम्मूराबी' के सैन्य अभियान](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8/): ‘हम्मूराबी’ द्वारा बेबिलोनियन साम्राज्य की स्थापना हेतु किए गए सैन्य अभियानों को दो कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है। हम्मूराबी का प्रथम सैन्य अभियान ‘हम्मूराबी’ ने अपनी राज्यारोहण के 6 वर्षों के बाद, प्रथम सैन्य अभियान प्रारंभ किया। अभियान के पूर्व के वर्षों में उसने सैन्य संगठन किया और देश में आंतरिक सुधारों तथा मंदिरों का निर्माण कर जनता का समर्थन और सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। 7 वें से 11 वें वर्ष तक ‘हम्मूराबी’ ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से सर्वप्रथम ‘एरेक’ और ‘ईसिन’ को जीतने की चेष्टा की। जिसके परिणामस्वरूप उसे ‘एलम’ […] - [हम्मूराबी: एक परिचय](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%af/): प्राचीन मेसोपोटामिया के इतिहास में सुमेरियनो को निर्णायक रूप से परास्त कर बेबीलोन में स्वतंत्र ‘पश्चिमी सेमाइट राजवंश’ की संस्थापक जाति, (अमर्रु,अमोराइट, केनानी या बेबीलोनियन) के छठे शासक तथा बेबीलोनियन साम्राज्य निर्माता ‘हम्मूराबी’ का शासनकाल राज्य विस्तार, प्रशासनिक संगठन और सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से सर्वाधिक गौरवशाली काल था। ‘हम्मूराबी’ का लगभग 42 वर्षों का शासनकाल ‘सुमेरियनो’ और ‘सेमेटिकों’ के मध्य सांस्कृतिक सामंजस्य का काल था। इस समय बेबीलोनियन देवता ‘मर्दुक’ और सुमेरियनो के देवता ‘एनलिल’ की अनन्यता स्थापित हुई। फलत: तत्कालीन समस्त पश्चिमी एशिया में ‘बेल- मर्दूक’ प्रमुख आराध्य बन गए। ‘मारी’ नगर के उत्खनन से प्रचुर संख्या में […] - [अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर 'स्पेन के गृहयुद्ध' का प्रभाव](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/): फ्रांको की गृहयुद्ध में विजय ‘धुरी-राष्ट्रों’ अर्थात ‘इटली’ एवं ‘जर्मनी’ तथा ‘फासिस्ट-विचारधारा’ की विजय थी तथा गृहयुद्ध के बाद स्पेन की विदेश नीति पूर्ण रूप से ‘जर्मनी’, ‘इटली’ और ‘पुर्तगाल’ की ओर केंद्रित हो गई। 1939 में स्पेन सरकार ने ‘जर्मनी’ और ‘जापान’ के बीच हुए ‘कामिंटर्न – विरोधी’ समझौते पर हस्ताक्षर किया। वस्तुत: ‘स्पेन’ में ‘फ्रांको’ के अधिनायक-तंत्र की स्थापना, ‘ब्रिटेन’ और ‘फ्रांस’ की कूटनीतिक पराजय का प्रतीक भी थी, 1940 मई में स्पेन ने ‘राष्ट्रसंघ’ की सदस्यता का परित्याग कर दिया तथा 1950 तक ‘स्पेन’ विश्व राजनीति में लगभग एकाकी बना रहा।   - [स्पेन की सरकार का पतन और फ्रांको की सत्ता की स्थापना](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%a8/): फरवरी 1939 में राष्ट्रपति ‘अजाना’ ने त्यागपत्र दे दिया तथा ‘फ्रांस’ और ‘ब्रिटेन’ ने ‘फ्रांको’ की सरकार को ‘स्पेन’ के शासक के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता दे दी। यद्यपि प्रधानमंत्री ‘नेगरिन’ ने राजधानी ‘मेड्रिड’ को आधार बना कर युद्ध जारी रखने का प्रयत्न किया परंतु फ्रांको की सत्ता को चुनौती देना असंभव था। 5 मार्च 1939 को निवर्तमान सरकार की रिपब्लिकन आर्मी के नेतृत्वकर्ताओं कर्नल ‘सेगिसमंडो कसाडो (Segismundo Casado)’ और समाजवादी नेता ‘जूलियन बेस्टेइरो (Jullian Besteiro)’ ने प्रधानमंत्री ‘नेगरिन’ के विरुद्ध ‘नेशनल डिफेंस काउंसिल’ का गठन कर ‘फ्रांको’ से संधि का प्रयास किया। ‘नेगरिन’ स्पेन छोड़कर 6 मार्च 1939 को […] - [स्पेन में गृहयुद्ध (1936-1939)](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%97%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-1936-1939/): 12 जुलाई 1936 को दक्षिणपंथियों ने एक वामपंथी पुलिस अधिकारी लेफ्टिनेंट ‘केस्टिलो’ की हत्या कर दी, जिसके प्रतिशोध में दक्षिणपंथी सैन्य अधिकारी ‘काल्वो सोंटेलो’ की हत्या वामपंथियों द्वारा कर दी गई। 17 जुलाई को मोरक्को स्थित स्पेनी सेनाओं ने जनरल फ्रांको के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। साथ ही स्पेन के दक्षिणपंथी उच्च सैन्य अधिकारियों द्वारा सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरंभ कर देने से स्पेन में गृह युद्ध प्रारंभ हो गया। इस गृहयुद्ध में दक्षिणपंथी पक्ष की सेना को स्पेन शासित ‘मोरक्को’, ‘पैम्पलोना’, ‘कैडिज’, ‘कार्डोंबा’, ‘सेविले’, ‘बर्गोस’, ‘जरगोजा’, ‘वैल्लेडोलिड’ की सेना की ईकाइयों का भी समर्थन था। दूसरी ओर […] - [स्पेन में गृहयुद्ध की पूर्वसंध्या में सामाजिक और राजनीतिक स्थिति](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): गृहयुद्ध के पूर्व आर्थिक स्थिति जुलाई 1936 तक स्पेन की कानून व्यवस्था पूर्णत: विनष्ट हो गई थी। स्पेन के नेता हिंसक क्रांति की तैयारी कर रहे थे और विदेशी राजनयिक स्पेन में अपने हितों के लिए संभावना तलाश रहे थे। अप्रैल से जुलाई 1936 के बीच हड़तालों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। श्रमिक कम काम के के लिए भी अधिकाधिक वेतन मांगते थे तथा दुकानों से खरीदे गए सामान का दाम या किराया नहीं देना श्रमिकों के लिए आम बात थी। इन श्रमिकों को सशस्त्र वाम उग्रवादियों का सहयोग था, अतः मध्यवर्ग और व्यापारी वर्ग ने भी मान लिया […] - [स्पेन में 1936 का निर्वाचन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-1936-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%a8/): फरवरी 1936 में वामपंथी दलों के संयुक्त मोर्चे ‘पॉपुलर फ्रंट’ और ‘दक्षिणपंथी एवं मध्यवर्ती दलों’ के गठबंधन के बीच हुए चुनाव में बहुत कम सदस्यों के अंतर से ‘पॉपुलर फ्रंट’ को संसद में मामूली बहुमत मिला तथा ‘अजाना’ ने केवल गणतंत्रवादियों की सदस्यता वाले मंत्रिमंडल का गठन किया। ‘अजाना’ ने वामपंथी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर अपने पहले कार्यकाल के कार्योँ जैसे – बड़े भू स्वामियों की भू संपत्ति का अधिग्रहण और पुनर्वितरण को पुन: प्रारंभ किया तथा कैटेलोनिया को भी स्वायत्तता दे दी। पॉपुलर फ्रंट सरकार ने सत्ताग्रहण के पहले माह में एक तिहाई प्रांतीय गवर्नरों को हड़ताल, जमीन […] - [स्पेन में प्रथम संसदीय निर्वाचन (नवम्बर 1933)](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-1933-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%a8/): स्पेन में नए संविधान के तहत हुए,1933 नवम्बर के प्रथम निर्वाचन में दक्षिणपंथी दलों के गठबंधन ‘Spanish Confederation of Autonomous Right Wing Group’ या ‘CEDA’ को 473 में से 207 सीटें मिली, ‘मध्यवर्ती दल’ या ‘Radical party’ को 167 तथा वामपंथी दलों को 99 स्थान मिले। सत्तारूढ़ दल की सदस्य संख्या में कमी से स्पष्ट था की तत्कालीन स्पेन में दक्षिणपक्षीय तत्वों का प्रभाव बढ़ रहा था। CEDA को 1933 के चुनाव में बहुमत मिलने के बावजूद उसके नेता ‘गिल रोबल्स (Gil Robels)’ को राष्ट्रपति ‘जामोरा’ ने, राजतंत्र का समर्थक और संविधान के प्रावधानों एवं निरंतरता के लिए खतरा बताकर, […] - [स्पेन में गणतंत्रवादी सरकार के निर्णय और प्रभाव](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/): भूमि सुधार  सितंबर 1932 में स्पेन की ‘कोर्टेज’ ने कानून पारित कर 5 करोड़ एकड़ से अधिक  अविकसित भूमि और स्पेन से निष्कासित व्यक्तियों की निजी-भूमि को बगैर मुआवजा दिए तथा कुछ कुलीनो की भूमि को मुआवजा देकर अधिग्रहित कर लिया तथा भूमिहीनों में इनके पुनर्वितरण की घोषणा की गई। इस कानून से भू-स्वामी कुलीन वर्ग और इसके कार्यान्वयन में अति विलंब से भूमिहीन सरकार के विरोधी बन गए तथा सामाजिक समरसता पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा। 2. कैथोलिक चर्च के विशेष अधिकारों की समाप्ति ‘कोर्टेज’ ने 1932 में एक कानून द्वारा ‘स्पेन’ में ‘जेसुइट’ संप्रदाय की मान्यता समाप्त कर […] - ['स्पेन' में 'गणतंत्र' की स्थापना](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be/): ‘स्पेन’ मे राजा के पलायन के बाद ‘अलकाला जामोरा’ की अध्यक्षता में ‘गणतंत्रवादियों’ और ‘समाजवादियों’ को शामिल कर एक अस्थायी कार्यवाहक सरकार गठित की गई। इस सरकार के द्वारा लिए गए कुछ निर्णयो में – अपनी विचारधारा के समर्थक राजनीतिक बंदियों को क्षमा प्रदान कर रिहा करना, राजा की संपत्ति जब्त करना, अभिजात वर्ग की उपाधियों को समाप्त करना, तथा, सभी नागरिकों को राजनीतिक, धार्मिक, स्वतंत्रता प्रदान करना शामिल थे। अस्थाई सरकार के इन निर्णयों की प्रतिक्रिया में ‘स्पेन’ के ‘कैथोलिक-चर्च’ ने जनता से उन प्रत्याशियों को चुनाव में निर्वाचित करने की अपील की, जो धर्म की रक्षा करें। इसके […] - [स्पेन में सैन्य अधिनायकत्व का कालखंड (1923 -1931)](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5/): जनरल ‘मिग्रयल प्राइमो ड रिवेरा’ का कार्यकाल सत्ता ग्रहण के पश्चात ‘रिवेरा’ ने सैनिक निदेशक मंडल का गठन कर संपूर्ण राष्ट्र में सैनिक-कानून लागू कर दिया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित, न्यायिक तंत्र में ‘जूरी’ के प्रावधान को प्रतिबंधित और समस्त म्युनिसिपलो एवं स्वायत्त संस्थाओं को भंग कर उसने ‘कैटेलोनिया’ के पृथकतावादी आंदोलन का दमन किया। ‘रिवेरा’ ने आर्थिक सुधारों के द्वारा ‘स्पेन’ के राष्ट्रीय बजट को संतुलित किया, जिससे मुद्रा का मूल्य स्थिर हुआ। उसने ‘स्पेन’ में आधारभूत संरचनाओ और संचार साधनों का विस्तार किया। ‘रिवेरा’ ने ‘मोरक्को: के विद्रोहियों का दमन कर अपनी प्रभावी विदेश नीति के तहत […] - [स्पेन के गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf/): 19 वीं सदी से ही स्पेन राजनीतिक-सामाजिक अव्यवस्था के दौर से गुजर रहा था। 1812 में स्पेन में संविधान लागू हुआ,जिसने राजा के अधिकार को सीमित कर उदारवादी राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर किया लेकिन ‘राजा फर्डिनेंड VII’ द्वारा संविधान को निरस्त तथा ‘Trienio liberal government’ को अपदस्थ करने के बाद ‘1814 – 1874’ के मध्य स्पेन में कई विद्रोह हुए। स्पेन में व्याप्त असंतोष का मुख्य कारण 1868 में स्पेन के शहरों में हुए दंगे, मध्य वर्ग में उदारवाद का प्रसार और अति रूढ़िवादी राजशाही और सेना के मध्य सहयोग था। राजनीतिक अव्यवस्था के इस दौर में […] - [स्पेन का गृहयुद्ध: एक परिचय](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%af/): ‘स्पेन का गृहयुद्ध (Spanish Civil War)’ स्पेन में 1936 -1939 के मध्य स्पेन के ‘गणतंत्रवादियो (Republicans)’ और ‘राष्ट्रवादियों (Nationalists)’ के मध्य हुआ सशस्त्र सत्ता-संघर्ष था। स्पेन में गृहयुद्ध आरंभ होने के समय ‘मेनुअल अजाना’ के नेतृत्व में ‘पॉपुलर फ्रंट’ की सरकार थी, जिसे ‘कोर्टेस (संसद)’ में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियों का समर्थन था। ‘स्पेन’ के ‘गृहयुद्ध’ में युद्धरत दोनो विरोधी गुटों, जिन्हें ‘गणतंत्रवादी (Republicans)’ और ‘राष्ट्रवादी (Nationalist)’ कहा जाता है, उनमें शामिल दल थे। Republicans, इस गुट से सम्बन्धित दल, ‘द्वितीय स्पेनी गणतंत्र’ में सत्तारूढ़ साम्यवादी विचारधारा वाली ‘पॉपुलर फ्रंट (Popular Front) सरकार के समर्थक थे। पॉपुलर फ्रंट सरकार में […] - [हर्षचरित : एक ऐतिहासिक कृति](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%90%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): ‘बाणभट्ट’ ने अन्य दरबारी लेखकों की बातें ‘हर्षचरित’ में ‘हर्ष’ की उपलब्धियों का अतिश्योक्तिपूर्ण विवरण नहीं दिया है। ‘हर्षचरित’ और ‘कादंबरी’ में उल्लेखित तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक शैक्षणिक और अन्य संदर्भों से ‘बाणभट्ट’ की एक इतिहासकार की छवि और उसकी कृतियों की ऐतिहासिकता पुष्ट होती है। इनमें ‘बाण’ ने समाज के विभिन्न वर्गों की स्थिति, प्रव्रज्या प्राप्त श्रमणों और ब्राह्मणों के दैनिक जीवन, शिक्षा-व्यवस्था, शैक्षणिक विषयों, प्रचलित शिल्पों का विवरण दिया है। ‘हर्षचरित’ में ‘बाण’ ने निम्नलिखित संप्रदायों जैसे ‘अर्हत (जैन)’, ‘मस्करी (परिव्राजक)’, ‘श्वेतपट (श्वेतवस्त्रधारी भिक्षु)’, ‘भागवतवर्णी (ब्रह्मचारी)’, ‘केशलुंचक (बाल उखाड़ फेंकने वाले)’, ‘कापिल (सांख्य मत)’, ‘लोकयातिक (चार्वाक दर्शन)’, ‘कणाद’, ‘औपनिषादिक’, ‘एश्वरकार्णिक […] - [हर्षचरित की विवेचना](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be/): ‘हर्षचरित’ की रचना का उद्देश्य एक इतिहासकार का उद्देश्य, अतीत का सत्यान्वेषण होता है लेकिन ‘बाणभट्ट’ द्वारा ‘हर्षचरित’ की रचना का औचित्य सिद्ध करने के प्रयास से यह संकेत मिलता है कि इसमें उल्लेखित कुछ तथ्य यथार्थ से परे हैं। ‘श्रीराम गोयल’ ने अपनी पुस्तक, “हर्ष शिलादित्य” – “एक नवीन राजनीतिक सांस्कृतिक अध्ययन”, में ‘हर्षचरित’ की रचना के उद्देश्यों को समझने पर बल दिया है। ‘हर्षचरित’ की अंतिम पंक्तियों में ‘हर्ष’ के राजगद्दी पर बैठने, ‘शशांक’ के विरुद्ध उसकी सेना के प्रयाण एवं जंगल में सती होने के लिए चिता में प्रवेश करने के पूर्व ‘राज्यश्री’ को बचा लेने संबंधी […] - [बाणभट्ट : इतिहास-पुराण के प्रतिनिधि](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf/): ‘बाणभट्ट’ , प्राचीन भारत में विकसित ‘इतिहास-पुराण’ परंपरा के प्रतिनिधि लेखक थे। महाकवि ‘बाण’ का आविर्भाव सातवीं सदी के आरंभ में हुआ था। वह ‘भार्गव’ वंशी ब्राह्मण थे। प्राचीन ग्रंथों में इस तथ्य का बारंबार उल्लेख हुआ है कि ‘इतिहास-पुराण’ परंपरा के वाहक ‘भार्गव’ कुल के होते थे। अत: इतिहास लेखन उनके वंश की परंपरा थी। ‘बाण’ , पुष्यभूति सम्राट ‘हर्षवर्धन’ के राजकीय इतिहास लेखक और कवि थे। ‘बाणभट्ट’ ने ‘हर्षचरित’ , ‘कादंबरी’, ‘चंडीशतक’ तथा ‘पार्वती-परिणय’ नामक ग्रंथों की रचना की, लेकिन उन्हें एक इतिहासकार के रूप में स्थापित करने वाली रचना ‘हर्षचरित’ है। यद्यपि ‘हर्षचरित’ पूर्णरूपेण इतिहास नहीं बल्कि […] - [अखनाटन : प्रकृति पर आधारित एकेश्वरवाद](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be/): ‘अखनाटन’ प्राचीन मिस्र ही नहीं अपितु विश्व इतिहास का सबसे विलक्षण शासक था।उसने बहुदेववाद तथा धार्मिक भ्रष्टाचार और धर्म का राजनीति पर अवांछनीय प्रभाव को समाप्त कर कर्मकांडों से मुक्त एकेश्वरवाद ‘एटन’ की उपासना को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया।  मिस्र विद्या विशारद ‘जेम्स हेनरी ब्रेस्टेड’ और ‘आर्थर वीगल’ की मान्यता है कि — ‘अखनाटन’ विश्व इतिहास में पहला मनुष्य था, जिसने धार्मिक और सामाजिक बंधनों को तोड़कर अपने व्यक्तिगत आदर्शवाद को मूर्त रूप देने की चेष्टा की इसलिए उसे ‘इतिहास का प्रथम व्यक्ति’ कहा जाता है। ‘अखनाटन’ के धार्मिक विचार प्रकृत्या सर्वथा आधुनिक ओर पूर्णत: वैज्ञानिक थे। अखनाटन के […] - [अखनाटन के धार्मिक नवाचार : 'एटनवाद' की विशिष्टताएं](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0/): ‘अखनाटन’ द्वारा प्रवर्तित एवं स्थापित धार्मिक नवाचारों एवं सिद्धांतों की विशिष्टताएं – 1. एकेश्वरवाद ‘मिस्र’ विद्या विशारदो के मध्य यह विवादित प्रश्न है कि क्या ‘एटनवाद’ को पूर्ण ‘अद्वैतवाद’ अथवा ‘एकेश्वरवाद’ माना जाए अथवा इसे सहिष्णु एकेश्वरवाद, धार्मिक पंथों के मध्य समन्वय तथा एकाधिदेववाद की श्रेणी में रखा जाए। कुछ विद्वानों के मतानुसार ‘अखनाटन’ का धर्म मुख्यतः ‘अद्वैतवाद’ से संबंधित था जबकि कुछ अन्य विद्वान अखनाटन को ‘सहिष्णु-एकेश्वरवाद’ का प्रवर्तक मानते हैं, जिसने अन्य देवताओं के अस्तित्व को नकारा नहीं लेकिन केवल ‘एटन’ की पूजा की अनुमति दी। ‘अखनाटन’ जिस ‘एकेश्वरवाद’ का प्रथम अन्वेषक था वह कालांतर में ‘यहूदी धर्म’ […] - [अखनाटन का धर्म 'एटनवाद'](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%8f%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/): प्रारंभ में ‘अखनाटन’ ने मिस्रवासियों के समक्ष ‘एटन’ को पारंपरिक सर्वोच्च देवता ‘Amun-Ra’ के एक प्रतिरूप के रूप में प्रस्तुत किया। अपने धार्मिक विचारों का सामंजस्य प्राचीन मिस्री धार्मिक परंपराओं से करने के लिए उसने,  ‘सूर्य-चक्र’  को ‘एटन’ नाम दिया तथा उसका नवीन देवता अपने पूर्ण स्वरूप में ‘Ra-Horus’ था। ‘Donald B. Redford’ ने अखनाटन द्वारा एटनवाद  के प्रवर्तन को  ‘Aten Iconography (एटन मूर्ति विज्ञान)’ में आए परिवर्तनों की दृष्टि से तीन अवस्थाओं में विभक्त किया है —  प्रारंभिक मध्यवर्ती और अंतिम। प्रारंभिक अवस्था –  यह अवस्था ‘सूर्य-चक्र’ के चित्रण में वृद्धि से संबद्ध थी। जिसमें ‘सूर्य-चक्र’ को देवता  ‘Ra […] - [अखनाटन एक धर्मप्रवर्तक](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95/): प्राचीन मिस्र में 18 वें राजवंश के फराओ ‘अमेनहोटेप IV या अखनाटन’ को ‘जेम्स हेनरी ब्रेस्टेड’ ने इतिहास का प्रथम ‘एकेश्वरवादी’ कहा है। ‘अखनाटन’ को विश्व का महान आदर्शवादी विचारक, अज्ञेय, रहस्यपूर्ण , क्रांतिकारी और इतिहास के प्रथम विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया जाता है, लेकिन उसे विधर्मी, पाखंडी, कट्टरपंथी तथा विक्षिप्त भी कहा जाता है। विश्व इतिहास में ‘अखनाटन’ की प्रसिद्धि उसके धार्मिक विश्वासों-विचारों तथा उस धर्म के लिए है, जिसे उसने स्थापित करने का प्रयास किया। एटनवाद, एटन-धर्म , अमर्ना-धर्म या अमर्ना-विधर्म उस धर्म और धार्मिक परिवर्तनों के परिचायक हैं, जिसका सूत्रपात ‘फराओ अखनाटन’ ने किया […] - [प्राचीन सप्तांगिक राज्य और आधुनिक प्रभुसत्तात्मक राज्य : विवेचन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/): ‘अर्थशास्त्र: में राज्य के सातों अंगों के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार हर पूर्ववर्ती अंग,परवर्ती अंग से अधिक महत्वपूर्ण है – यथा, अमात्य-जनपद से, जनपद-दुर्ग से,  दुर्ग-कोष से एवं कोष-दंड से अधिक महत्वपूर्ण है। ‘कौटिल्य’ के अनुसार, ‘स्वामी’ सभी अंगों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यथेष्ट गुणों से संपन्न होने पर वह अन्य अंगों को भी उनके लिए निर्धारित गुणों से संपन्न बना सकता है। अन्यथा उसके अयोग्य होने पर अन्य अंगों के गुणों से किसी भी अर्थ की सिद्धि नहीं होगी। ‘मौर्योत्तर’ और ‘गुप्त काल’ में राज्य के सात अंगों के पारस्परिक महत्व के संदर्भ […] - [कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत में राज्य के विभिन्न अंग](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): 1. स्वामी ‘सप्तांग सिद्धांत’ से संबंधित सभी स्रोत ग्रंथों में, राज्य के प्रधान के लिए ‘स्वामी’ शब्द का उल्लेख हुआ है। जिसका अर्थ है, अधिपति। ‘कौटिल्य’ द्वारा वर्णित व्यवस्था में, राज्य-प्रधान को अत्यंत उच्च स्थिति प्रदान की गई है। उसके अनुसार ‘स्वामी’ को अभिजात्य, प्रज्ञावान, शिक्षित, उत्साही, युद्ध कला में चतुर तथा अन्य उत्तम चारित्रिक गुणों से संपन्न होना चाहिए तथा काम, क्रोध ,लोभ,मोह आदि दुर्गुणों से दूर रहना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार स्वामी के दो मुख्य कर्तव्य होते हैं – प्रथम, उसे अपने प्रजाजनों के सुख और हित पर पूर्ण ध्यान देना चाहिए तथा द्वितीय, अन्य राज्यों के क्रियाकलापों […] - [कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत : परिचय](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4/): प्राचीन भारत में राजनीतिक चिंतकों ने राज्य की प्रकृति का निरूपण  ‘सप्तांग सिद्धांत’ के द्वारा किया था । वैदिक साहित्य और प्रारंभिक विधि-ग्रंथों अर्थात ‘धर्मसूत्रों’  में  ‘राज्य’ की परिभाषा नहीं मिलती है। यद्यपि कुछ प्रारंभिक ‘धर्मसूत्रों’ में राजा, अमात्य, विषय आदि कतिपय राज्य से संबद्ध अंगों का उल्लेख है,लेकिन बुद्ध के युग में ‘कौशल’ और ‘मगध’  जैसे संगठित राज्यों के उत्थान के बाद सर्वप्रथम ‘कौटिल्य’ कृत ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य की पूर्ण परिभाषा प्राप्त होती है । ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य को सात अंगों से युक्त संस्था के रूप में परिभाषित किया गया है तथा परवर्ती ग्रंथों के लिए भी यह परिभाषा […] - ['जियाउद्दीन बरनी' की रचनाओं में तथ्यों के प्रस्तुतिकरण की शैली](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%8f/): ‘बरनी’ ने ‘तारीख- ए-फिरोजशाही’ , 1357-1358 ईस्वी, में पूरी की। उनकी रचना मध्यकालीन भारतीय इतिहास लेखन के विकास को दर्शाती है। इसमें उन्होंने केवल हिंदुस्तान के मुस्लिम शासकों एवं सत्ता को अपने विवरण का केंद्र बनाया है। इस कृति के विभिन्न अध्याय अलग-अलग शासनकाल पर आधारित है और वे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करते हैं। हर अध्याय के आरंभ में ‘बरनी’ ने शाही राजकुमारों तथा विभिन्न अमीरों की सूची दी है तथा ‘फिरोज शाह तुगलक’  के शासन काल को 11 अध्यायों में बांटकर, उस अवधि की सामान्य विशेषताओं को उद्धृत किया है। ‘बलबन’ द्वारा सत्ता के एकीकरण, विशेषतः ‘अलाउद्दीन […] - [एक इतिहासकार के रूप में 'जियाउद्दीन बरनी' का मूल्यांकन](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af/): एक इतिहासकार के रूप में ‘बरनी’ का मूल्यांकन उनकी —  इतिहास विषयक अवधारणा, रचनाओं के उद्देश्य, सूचना स्रोत और तथ्यों के प्रस्तुतीकरण की शैली के परिप्रेक्ष्य में किया जा सकता है। इतिहास विषयक अवधारणा और रचनाओं के उद्देश्य  —  बरनी ने इतिहास संबंधी अपने विचारों और उद्देश्यों का विस्तृत उल्लेख ‘तारीख ए फिरोजशाही’ की भूमिका में किया है उनकी ऐतिहासिक दृष्टि पर ‘कुरान’ का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है क्योंकि मध्यकालीन उलेमाओं की तरह वे विज्ञान की समस्त विधाओं की उत्पत्ति का स्रोत ‘कुरान’ को मानते हैं। बरनी इतिहास को प्रेरणा स्रोत एवं जीवन यात्रा को बेहतर बनाने का साधन […] - [जियाउद्दीन बरनी](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%80/): ‘जियाउद्दीन बरनी’ की गणना मध्यकालीन विशेषकर ‘दिल्ली-सल्तनत’ के महानतम इतिहासकारों में की जाती है। एक विषय के रूप में इतिहास के प्रति ‘बरनी’ काफी आदर भाव रखते थे, उनके अनुसार — “इतिहास की नीव सत्यवादिता पर टिकी होती है, इतिहास लोगों को ईश्वरीय वचनों, कार्यों तथा शासकों के सत्कार्यों से परिचित कराता है। इतिहासकार को सत्य वादी, निर्भीक और ईमानदार होना चाहिए क्योंकि अपने गलत कथनों के लिए उसे ईश्वर द्वारा दंडित होना पड़ताहै।” बरनी की कृतियां ‘तारीखें ए फिरोजशाही’ और ‘फतवा ए जहांदारी’ ऐतिहासिक दृष्टि से अमूल्य हैं, जिनसे सल्तनत-कालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, समस्याओं तथा उनके समाधान […] - [मिस्र के इतिहास के अध्ययन के स्रोत](https://comprehensivehistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b/): प्राचीन विश्व की नदी घाटी सभ्यताओ  में से एक “मिस्र की सभ्यता”, नील नदी की घाटी में उदित,पल्लवित और संवर्धित हुई थी। मिस्र अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर पश्चिम में नील नदी द्वारा सिंचित एक छोटा देश है।मिस्र मूलत: लीबियन रेगिस्तान का एक भाग है, जिसके मध्यवर्ती भाग में नील नदी द्वारा सिंचित एक उर्वर भू पट्टी है, जो मिस्र के संपूर्ण क्षेत्रफल का 3.5 हिस्सा मात्र है। मिस्र उत्तर में भूमध्य सागर, पश्चिम में “लीबियन रेगिस्तान”, पूर्व में “लाल सागर” और दक्षिण में नील के नदी के महाप्रपातों से घिरा है। इन प्राकृतिक सीमाओं से सुरक्षित रहने से 340 ई. पू. […] ## Pages - [The Idea of Bharat](https://comprehensivehistory.com/the-idea-of-bharat/) - [Sample Page](https://comprehensivehistory.com/sample-page/): This is an example page. It’s different from a blog post because it will stay in one place and will show up in your site navigation (in most themes). Most people start with an About page that introduces them to potential site visitors. It might say something like this: Hi there! I’m a bike messenger by day, aspiring actor by night, and this is my website. I live in Los Angeles, have a great dog named Jack, and I like piña coladas. (And gettin’ caught in the rain.) …or something like this: The XYZ Doohickey Company was founded in 1971, […] - [My account](https://comprehensivehistory.com/my-account-2/) - [Checkout](https://comprehensivehistory.com/checkout/) - [Cart](https://comprehensivehistory.com/cart/) - [Shop](https://comprehensivehistory.com/shop/) - [Contact](https://comprehensivehistory.com/contact/): Need Help? Comprehensive History aims to be a one stop resource for the learners of History for their Degree Courses (B.A. & M.A. in History) and for other Competitive Examinations. Send Us a Message - [My Account](https://comprehensivehistory.com/my-account/) - [All Courses](https://comprehensivehistory.com/all-courses/) - [About](https://comprehensivehistory.com/about/): About Us First Comprehensive Online Learning Platform dedicated to History Dr. Jyoti Sinha – Founder Editor Our Story A nobel initiative by Dr. Jyoti Sinha, two times UGC-NET qualified, Ph.D. in History from Patna University and currently working as an Assistant Professor and Head of Department (PG), Ram Lakhan Singh Yadav College, Bakhtiyarpur, Patliputra University, Patna, Bihar, to help the students of Bihar in general and students of Patliputra University in particular to easily understand the facts of History for their Degree Courses and for the success in other competitive examination. - [Home](https://comprehensivehistory.com/): The Past Teaches us About the Present The diversity of human experience helps us to understand how people and societies behaved and allows us to appreciate other cultures, ideas, and traditions Learn History Ancient History 5000 years – From 3000BC to 500 AD Medieval History From the 5th Century to the end of the 15th Century Modern History From the 15th Century to the Present Based on the Syllabus of Patliputra University A dedicated wesite for the students of History of both Undergraduate and Postgraduate course of Patliputra University, Patna, Bihar A Comprehensive Resource of History History is an essential […] [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)